– शिवजी पाण्डेय ‘रसराज’

हम गरीबने पर अइसन, अन्हेर काहें?
देहि धुनलो पर खइला में देर काहें?
दिन भर करत-करत काम, झाँवर हो गइले चाम,
छिन भर देहिया के सुबहित ना, मिलले आराम,
नीक कइलो पर विधना क फेर काहें?
का अंजोर का अन्हार, एकही लेखा हमार,
कबो सूखा के मार, कबहीं ठरवत टुसार,
महँगी घहरेले हमरे, मुड़ेंर काहें?
कहलऽ आई सुराज, होई समता के राज,
ऊँच-नीच, भेद-भाव, रहित होई समाज,
हमके तनकी सा, उनका के, ढेर काहें?


शिवजी पाण्डेय ‘रसराज’
ग्रा0पो0-मैरीटार, बलिया

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