– चन्द्रदेव यादव


    (एक)

पवन पानी धूप खुसबू
सब हकीकत ह, न जादू !
जाल में जल, हवा, गर्मी
गंध के, के बान्ह पाई?
रेत पर के घर बनाई?

हम नदी क धार देखीं
फिर आपन बेवहार देखीं,
भूमि-जल पर आज नइकी
सभ्यता क मार देखीं
जेह दिया से हो उजाला
वोह दिया से घर जराईं !

एक भुजा में दर्द होखे
दूसरी तब जर्द होखे,
आँच गुंबद पर जे आवे
कलस रोये, सर्द होखे
चान-सूरुज के मिला के
के सही रस्ता देखाई?

ई हकीकत, ना फसाना
एके जानत ह जमाना
कट के माटी धूर से केहु
गाई ना सुख क तराना
सात रंग हो, सात सुर त
जग हमेसा मुस्कुराई !

    (दू)

हम अपने आँगन क माटी
सँच के रक्खीला,
माटी ना, पुरखन क थाती
सँच के रक्खीला !

कबों-कबों पलकन से छू के
एकर तिलक लगाईं,
माँ क ममता, प्यार पिता क
छन भर में पा जाईं
ई माटी ह राग प्रभाती
सँच के रक्खीला !

जानल-अनजानल चीजन क
एसे खुसबू आवे,
भूलल-बिसरल पितरन क
ई माटी अलख जगावे
एम्में ह आपन परिपाटी
सँच के रक्खीला !

एह में जब-तब तुलसी चौरा
कोहबर क छबि दीखे,
एह में जियन-मरन क छाया
सारे सपन सरीखे
दियवट पर क दीया-बाती
सँच के रक्खीला !

    (तीन)

काम पे मजूर
साम हवे अभी दूर
हौ थकान भरपूर
ई मजूरन क सदियन क जंग ह,
राह जिनगी क सचमुच में तंग ह !

रोज कुआँ खोद खोद रोज जल पीएलं,
एही तरे कामगार जीवन भर जीएलं
लहू के निचोड़ेलं
पाथर के तोड़ेलं
सुख के कन जोड़ेलं
ओनकर खुसी त कुबेर घरे बंद ह !

जबले ह जाँगर तबै ले अहार ह,
पौरुख के थकतै ई जिनगी पहाड़ ह
साँझ क दुकूल
ओम्में चाँदनी क फूल
समै सदा प्रतिकूल
एह मजूरन क जिनगी बदरंग ह !

उमिर घटे रोज नाहीं कर्जा कभी रे,
लइकन के मिले कहाँ दूध आउर घी रे
जीवन गरीबी में
अउर बदनसीबी में
कटे नाउमीदी में
जीवन का एनकर? अँधेरी सुरंग ह
हाथ में ह दीया मगर जोत मंद मंद ह !

    (चार)

जिनगी घर क फूटल-पचकल
धुँअसल बासन ह
कब से खुसी बदे तरसत
ई चेहरा आपन ह !

लिख के बारहखड़ी समय, फिर
एके पचरेला,
सतर खींच, अनलिखा छोड़ के
पल में बिसरेला
जिनगी खरिहाने में सूखल
पड़ल बढ़ावन’ ह !

उमिर हवे पगडंडी जेह पर
काँट-कूस ह जामल,
ठिल्ली के बेंगा नाईं दुख
घर में ह तावल
सुख गोहरउले वाला सँच के
रक्खल आलन ह !

बहुत जतन कइली सुख-सम्पत
घर में आइल ना,
नादी में क दूध पसर भर
कबों फोंफाइल ना
कइसे आई खुसी घरे, जब
फेरल तावन’’ ह !

    (पाँच)

कल से नल से हवा आ रहल
पानी भइल हराम,
चलत-चलत थक गइल सहर
फिर हो गइल चक्का जाम !

चौहद्दी बढ़ गइल सहर क
गाँव भइल बेहाल,
धोख जहाँ पर रहैं खेत में
उहाँ खड़ा अब महल
निरधंग के चूल्ही में पसरल
चुप्पी आठो जाम !

भारी होते गइल
गरे क हार सेठानी क,
मँहगाई में चमकल चेहरा
खूब किरानी क
रोज कुआँ के खोदे वाला
जपैं राम क नाम !

एक-एक पइसा खातिर जूझत
हवैं इहाँ मजदूर,
पइसा क खरिहान लगा के
केहू ह मगरूर
बिक गेल पूँजी हाथ जुन्हैया
निरधन खातिर घाम !


(भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका पाती के जनवरी 2017 अंक से साभार)


हिन्दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली-110025
मोबा. 9818158745

बढ़ावन – पहिले खरिहान में गोबर क गोल पिंड बना
के पइर या अनाज के रास पर एह उमेद से रक्खल
जात रहल कि एसे अनाज में बढ़ोत्तरी होई एही पिंड के
बढ़ावन कहल जात रहल ।

तावन – नारी के पानी के अपने खेत में ले जाए बदे
ओकरी मेड़ के काट के बित्ता भर आगे नारी के बान्ह
दीहल जाला। नारी के बान्हे बदे माटी से जवन रोक
लगावल जाला ओके ‘तावन’ कहल जाला। ई क्रिया
संपन्न भइले पर कहल जाला कि ‘तावन फेर गइल ह’।

धोख – बिजूका

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