जयकान्त सिंह के तीन गो कविता – नया आ पुरान

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

JaiKantSighJai

जेठ भाई के निहोरा

करऽ जन अनेत नेत, बबुआ सुधारऽ सुनऽ,
तूँही ना ई कहऽ काहे होला रोजे रगड़ा ।
आपन कमालऽ खालऽ, एनहूँ बा उहे हालऽ
आर ना डरेड़ फेर, काहे ला ई झगड़ा ।।

चूल्हे नू बँटाला कहीं, इज्जतो बँटाला बोलऽ,
ओठ सी के सुनऽ आजो ओही के जोगाइले ।
भूँजा फांकी-फांकी पाँखी दिहली जो तोहरा के,
जहाँ रहऽ फूलऽ फलऽ इहे गोहराइले ।
बबुआ तूँ नीख खूब दिहलऽ बूढ़ारी में ई,
टोक दीं त होई महाभारते नू तगड़ा ।।

अपना ओह कइला के कइलीं का खोजी कबो,
धके हाथ छाती पर तूँहीं खुद कहऽ ना ।
अपने के देखऽ सुनऽ, हमरा के छोड़ बाबू,
जीअ ताड़ऽ सुख से त, खुशी मने रहना।
कहिहऽ निधड़के जो, काम पड़े हमरा से,
आजो ना कुनेत नेत भाई भले बगड़ा ।।

खेतवा में खटि खटि, खूनवा जराईं सोचीं,
भाई पढ़ जाई दुख आई ना ई पँजरा ।
दुनिया जो देखी-सुनी, दिन दशा हमनी के,
नजर मिलाई का लगाई मुँहे कजरा ।
साँचो आज साँच लागे, सपना ना साँच होला,
तबहूँ तोपिले जे ना पीटे केहू नगड़ा ।।

तोहरा में बोलीले जे, हमरा में पारऽ भाँजी,
आभी-गाभी मारेलऽ त हम का ना बुझीले ।
इरखा करीं ना कबो, पाछ ना छोड़ेलऽ तबो,
भागिले बचाके जान अपने से जुझिले ।
तब काहे हमरा से टेंट तूँ बेसाहऽ ताड़ऽ,
झूठ-मूठ काहे के लगावऽ रोजे लफड़ा ।।

जेही पार लगलें बनवलीं, बिगड़लीं ना,
कइसे के बिधना हमार ऊ बिगड़िहें ।
हँकलीं ना माल कबो, केहू के जिरात में त,
भला अनसोहात केहू काहे मोर लसरिहें ।
अटल ई आस बिस्वास बाटे कान दीहऽ,
जुड़ी नाहीं घीव त ना घटी कबो अँखड़ा ।।

धने धन बाटे मन, सुख से जिएलऽ सुनी,
रहितऽ बेकार त कपारे नू खइतऽ ।
पेट काटी जेठ के धरम जो ना रखितीं त,
हेंगऽ नानू हमरा के आँखि तूँ देखइतऽ ।
धन के बढ़ल नीक, मन बढ़ी करी दीक,
मनवा के धनवा, ना टिके जन अगड़ा ।।

(17 जुलाई, 1989 के लिखल)


ससुरारी के सबख बुताइल

मोका मिलल जाये के भाई का ससुरारी
महटिअइतीं त कइसे, रहे हमरो लाचारी
एगो दिन भादो के, रास्ता कींच कादो के
बिरेक रहे साइकिल के सुनी कुछ ढीला
खाला में ढुल गइल, हो गइनी गीला
मान-आदर तह भइल, जवन कबो ना भुलाई
लिखल जाए त एगो ग्रंथे लिखाई
भइल शुरु बतकही निकले लागल पम्पा पर पम्पा
मिलली सारी खिलल चमेली सरहज मुस्काइल चम्पा
लगली सरहज सराहे, हमहूँ लगनी ढाहे
बात बात में लेवे लगनी चुस्की
नइकी सरहज भीतरे छोड़े मुस्की
भइल गदबेरा, कहनी चले के बात
झटसे उठल नइकी सरहज,
धइलस दहिना हाथ
मुँह चुनिया के धरवलस किरिया
गँवे गँवे आके सट गइल भिरिया
फेर चीकन चेहरा हँसमुख बोली
पाके मन मिजाज केकर ना डोली
रुक गइनी रात के अब ना सुनी बात के

सुतेला मिलल रात के एगो उपास खटोला
फेर हमहीं रहीं जागल, निसबद रहे टोला के टोला
जब लगलें स मच्छर आपन आपन छड़ पिजावे
हमहूँ लगनी उठके हनुमान चलीसा गावे
ओहू फे ना तिराइल त काली माई के गोहरावे
आह रे राम! भइल काली के किरपा,
निकललें स खटमल खटोला से बनबना के
धावा बोल देलें स आपन आपन टेंगुड़ा टनटना के
नीचे खटमल खीचे खून
ऊपर मच्छर का दोसरे धून
लगे रहे ना टरच बती
खटमल पाटल रती रती
का कहीं, छनेभर में अंगे अंग पाट गइलें स
बिखियाइल माटा नियन किटकिटा किटकिटाके धइलें स
भुला गइल फेर सारी सरहज के हँसी खेल
रात अंहारा चुवे ओसारा तिसरे में ई बड़का झमेल
केहुँग केहुँग कटनी रात

अब सुनी आगे के बात
दोसरा गाँव में गइनी तब भइल अँजोर भिनसार
अपना दुअरा बइठल रहले हमार पुरान इयार
निहोरा पाती कइलें कइनीं दुअरा नास्ता
फेर पूछलें जे भोरहीं भोरहीं कइसे धइलऽ ह कवि रास्ता
कुल्ह कहानी सुनके इयारो रहस भकुआइल
कहनी जे सारी सरहज के सइंतल सवख बुताइल.

(सन् १९८५ – ८६ के लिखल बहुत अइसन कविता बाड़ी सब, जवना के पढ़ल अब लरिकाही बुझाला. ओही में के ई कविता रहल जवना में अपना बड़ भाई का ससुरारी के भोगल अनुभव बा – जयकान्त सिंह ‘जय’)


आ आखिर में एगो

समसामयिक भोजपुरी गीत

केकरा कोसीं केकरा के सराहीं,
मुँह फेरीं केकरा से, केकरा के चाहीं
आस बिस्वास टूटल खातखात धोखा
ओकरे से दागा मिलल जेके देनी मोका ।
ऊ त खुशहाल बाड़ें, हमरा तबाही।।

भइंस आगे बीन के बजावल बकवासी ।
कुकुरे सियार के बा कुंडली में कासी।
बकुला दे भासन, हंस पीटे बाहबाही ।।

बनरा के चाल धइलें जनता अनाड़ी
नेतवा नचावे तबसे बनके मदारी
ठग ना उपास पड़ी, लोभी भइलें दाही ।।

केहू देखे जात धरम, भाई आ भतीजा
चुनाव में बिकाये वाला, सोंचे ना नतीजा
ठग के ठगे में भला केकरा मनाही।।

(04/09/2015)

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