– ओमप्रकाश अमृतांशु

giddha
कांचे कोंपलवा मड़ोड़ि दिहलस रे,
इंसान रूपी गीधवा जुलूम कइलस रे.

खेलत-कुदत-हँसत रहले हियरवा,
अनबुझ ना जाने कुछु इहो अल्हड़पनवा,
रोम-रोम रोंवां कंपकंपाई दिहलस रे,
इंसान रूपी गीधवा जुलूम कइलस रे.

रूहवा घवाहिल खून में सनाइल,
हवसी के मनवा ना तनिको छोहाइल,
डभकत जिया टभकाई दिहलस रे,
इंसान रूपी गीधवा जुलूम कइलस रे.

अँखिया के लोरवा ना अबहीं सूखाइल,
दू-चार गो अवरू खबरिया सुनाइल,
गमकत सपनवा गेन्हाई दिहलस रे,
इंसान रूपी गीधवा जुलूम कइलस रे.

पल-पल डेराइल हलकवा सूखाइल,
कब जाने केकरा पे कब सामत आइल,
नर-भक्षी नजरी गड़ाई दिहलस रे,
इंसान रूपी गीधवा जुलूम कइलस रे.

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