डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ के तीन गो कविता

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

JaiKantSighJai

कलाम के शत शत नमन

माथ ऊँचा हो गइल दुनिया में भारतवर्ष के
सफल परमाणु परीक्षण बा विषय अति हर्ष के
देश का ओह सब सपूतन के बधाई आ नमन
जिनका पाके आज पवलस राष्ट्र एह उत्कर्ष के.

शांति निरस्त्रीकरण के पक्षधर ई आजो देश बा
बाकिर केहू कमजोर जनि बुझे इहे संदेश बा
साध के चुप्पी रहीं बइठल बहुत हम देर से
पड़ल जरुरत जो जदि होई परीक्षण फेर से.

विश्व परमाणु रहित होखे बिना भेदभाव के
भारत सफल होखे ना दी कोई कूटनीतिक दाव के
जे परीक्षण पर परीक्षण काल्ह तक करते गइल
ओकरो ला नागवार कि भारत ना ई अच्छा कइल.

काल्ह का आजो बढ़ाईं दोस्ती के हाथ हम
दुनिया बतावे घात कब कइनी केहू के साथ हम
अमेरिका अउरो कहीं जाके करो दादागिरी
जर्मनी जापान जनि बकधुन करे हमरा भीरी.

रक्षार्थ हम कुछउ करब अब रूस के रुसे ना दीं
नीयत जो आपन साफ़ बा, एह दुनिया के दुसे ना दीं
प्रतिबंध के धमकी देखावेला बुझे कमजोर बा
मिल जाई अंदाज ऊ अजमावे जोतना जोर बा.

राखे भा केहू तूड़ ले संबंध हमरा गम न बा
दुनिया के कवनो देश से भारत ई आपन कम न बा
कोंहरा के जे बतिआ बुझी अँगुरी देखाई तूड़ देब
खतरा बनी जे देश ला बारूद मुँह में हूँड़ देब.

गोरी पर गुमान बा त ढोंड़ी कर देब ढील हम
भूल कइल चढ़े के त अबकी कर देब गील हम
अमेरिका धमकावे जस कोंढ़िया डेरावे थूक से
पड़ी जरुरत जो अगर ई देश लड़ ली भूख से.

देश का स्वाभिमान पर ना आँच आवे देब हम
जे देखाई आँखि ओकर आँखि काढ़ि लेब हम
अन्ठानवे सन् देश ला सचमुच सोनहुला साल बा
तीनो परीक्षण एक संग एह देश के कमाल बा.

भारत का गौरव गान से बा गूँज रहल धरती गगन
बधाई बा अगुआ अटल , कलाम के शत शत नमन.

(सन् १९९८ के परमाणु परीक्षण के दिन लिखाइल कविता.)


विरह गीत

अँखिया तरसे दिने रतिया के हियवा
कुहूके करेजवा सेजियवा रे पियवा.

नयना के नीन जाने कहँवा पराइल
कवना मुलुकवा में जाई के भोराइल
पिहूके पपीहा प्रान पियवा रे पियवा.

आई के समाई गइल आँखि में सवनवा
दुअरा फागुन झूमे बदरा अँगनवा
हूके तार तार भइल जियवा रे पियवा.

तनिको ना नीक लागे घर अँगनइया
गवना कराके काहे बनल मुदइया
सोचली ना सपने में दगा दिही पियवा.

काँट लागे देहिया चढ़ल रंग पियरिया
कहिया जुड़ाई जिया लेब अँकवरिया
असरा के लहरे ला दिअवा रे पियवा.

(सन् १९८९ में लिखल)


भोजपुरी गीत

नागिन बन के डंसे डगरिया
धरती खसके पाँव से,
जब गुजरीं तोहरा गाँव से.

छुपी कबले करुण कहानी
खोली राज जमाना
मंजिल तक जो ना पहुँचब
ई दुनिया मारी ताना
जब जब बइठल सोचीं सहमे
मनवा एही भाव से.

जेतने दरद दबाईं दिल के
नेहिया पनपत जाले
देखीं कली के संग भँवरा ई
रहा रहा जियरा साले
हियरा हहरे हवले हवले
तोहरा ए अलगाव से.

महक उठेला मन मंदिर में
प्रीतन के धूप काठी
हमरा तोहरा रुप गुण के
ई अंतर कब पाटी
जब जब गुजरीं तोहर नगरी
निरखीं नीके चाव से.

सोना चंदन चान के टुकड़ा
कोइल के अस बोली
देहिया चितवा चमके चेहरा
याद पड़े हमजोली
नि:स्वारथ जो प्रेम ई पनके
चैन चोरावे दाव से.

जयकवि कइसे दिल दरिया के
उठत ज्वार दबइहें
रूह जो रोवे केहू न जाने
कइसे नयन छुपइहें
धरम धरोहर करम कमाई
तोहरे लगन लगाव से.

(सन् १९८७ के लिखल)


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