– डॉ. कमल किशोर सिंह

(1)

पाला

साल बीतते फेरु से
पडे़ लागल जाड़ा.
लागेला हमरा के
मारी देलस पाला.

मन घास पात अस
मऊरा कठुआ जाला
रूई आ धुईं से
ना मन गरमाला.

देखते ही बहरी
देह बऱफ बन जाला.
कहाँ जाई , का करीं,
कुछो ना बुझाला .

बाकी फूटते किरिनिया ,
मन बरफ पिघल जाला .
बहे लागेला बहरी
देखे गड़हा ना नाला ,

गह गह लागेला चमके
जइसे घासफूस लहलहाला.
बाकी फूटते किरिनिया ,
मन बरफ पिघल जाला.

(2)

नयका साल

एक साल अउर सरक गइल ,
कुछ छाप आपन छोड़ि के.
भण्डार भरि के कुछ लोगन के ,
बहुतन के कमर तोड़ि के.

प्रकोप परलय के दिखा
दुनिया के कुछ झकझोरी के.
आईं बिदाई करीं एकर,
दसो नोहवा जोड़ी के.

आ स्वागत करीं नव वर्ष के ,
सहर्ष बहियाँ खोली के .
दुःख दर्द दुनिया के घटे
परस्पर प्रेम के परसार हो.

नयकी किरण नव वर्ष लावे ,
कहवों ना छिपल आन्हार हो .
धर्म जाति सब भेद भाव के
जन गन मन से बहिस्कार हो .

कोंपल नया सभ स्वस्थ निकले ,
पुष्पित फलित सब डार हो .
नव नीड़ के निर्माण हो ,
उजड़लो के उद्धार हो.

आ स्वागत करीं नव वर्ष के ,
सहर्ष बहियाँ खोली के .
दुःख दर्द दुनिया के घटे
परस्पर प्रेम के परसार हो.


डॉ. कमल किशोर सिंह
शिशुरोग विशेषज्ञ,
न्यूयॉर्क, अमेरिका

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