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– रामयश अविकल

चलीं ई सबुर के बन्हल-बान्ह टूटल
कमाये बदे आज घर-गाँव छूटल।
मिलल मार गारी, मजूरी का बदला
सरेआम अब आबरू जाय लूटल।
भवन तीन-महला शहर में बा उनकर
हमन के त झाँझर पलनियो ले टूटल।
इहाँ दाल-रोटी चलल बाटे मुस्किल
दइब टेढ़ भइले करमवो बा फूटल।
दबंगन के बा हर जगह जुल्म माफी
अबरकन के भाई-भवद बाटे रूसल।

(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका ‘पाती के 78 वां अंक’ से साभार)

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