दीयर कथा

आनन्द संधिदूत

एही दीयर में बा
हमरो खेत क एगो छोट-मोट टुकड़ा
जवन हम देखले नइखीं।

ओही खेत क गोजई-रहिला
जब हमरा आँगन में गिरे त
हमार माई ओइसहीं खुस हो जाय
जइसे कवनो लइका खेलवना पाके अगरा जाला
ऊ कुछ झारे कुछ झूरे
कुछ कूटे कुछ पीसे
कुछ अँगऊ निकाले
हमनियो का अनाज का राशि पर
गाल रगड़-रगड़ के लोटीं जा
आ अँजुरी में भर के अनाज
हुर-हुर हुर-हुर ओही अनजबे पर गिराईं जा
बाप बिहीन आँगन में बाप के बिरह
ओही अनजवे से खेल के भुलवाईं जा।

स्वतंत्रता का बाद
लाला क खेत
समाज का दया आ करुणा से हरियर
बोवनिहार निठाली बतावसु
फलाना दू हाथ बढ़ के जोत लिहलन
भा, घोड़रज-निलगाय फसल लँहेद दिहलन स
भा, गंगा माई बोवल साँवाँ पर ओलर परली
चाहे समय का पहिले पछुआ हवा का बहि गइले
मोसल्लम गोजई पइया हो गइल।
हमार माई निठाली का सूचना पर
अपना आँख क आधा पलक नीचे गिरवले
धरती मइया के ताकत चुप हो जाय
जइसे भारत माता
अपना देस क झण्डा आधा झुका के
पटुआ गइल होखसु
थउस के मौन शान्त हो गइल होखसु।

हम देखले नइखीं
लेकिन एही दीयर में बा
हमरो खेत क एगो छोट-मोट टुकड़ी
जवन चकबन्दी में दस मण्डा का बजाय
आठ मण्डा क बिगहा भइला का बाद
कई मन अनाज कम देबे लागल
लेकिन ए बेरी हमार माई उदास ना भइलि
ऊ कहलसि अब कवन चिन्ता बा
हमार बच्चा नोकरी धऽ लिहलन!

ओही खेत क एगो हिस्सा
जब कई जुग खातिर
गंगा का पानी में डूब गइल
त सरकार नोटिस भेजलसि
पुछलसि कि बतावऽ
खेत रखबऽ कि छोड़बऽ
छोड़बऽ त लगान ना लागी
हमार माई कहलसि
बेमार सवाँग घर से निकालल ना जाय
बालू पानी में डूबल जमीन छोड़ल ना जाय
जा सरकार से कह आवऽ
हम मालगुजारी देब!
जमनियाँ तहसील में
बयान दर्ज करावत घोषणा पत्र भरत
हमके अइसन लागल
कि अबतक ई खेत हमार गार्जियन रहल हऽ
अब हम एकर गार्जियन बानी।

लेकिन झूठ, सरासर झूठ
चालिस साल बाद उहे जमीन
अब पानी में से झाँकतिया
हिंगुआना-पहलेज से लथरल बिया
सवखीन परवर बोवले बाड़न
आ मलाह बोरो धान
आ प्रकृति बोवले बा
हिंगुआ, डिंभुकी, नारुन, नखदौन आ दुधकांड़र
आ एही कंचन हरियरी में बा
हमरो खेत क एगो छोट-मोट टुकड़ी
जवन हम देखले नइखीं।
जवना का पाछा दू लाठी खइले नइखीं
दू गारी सहले नइखीं
हमके लागऽता
जइसे अगल-बगल के हरेक गाँव-मौजा
हमरा पर हँसऽता
आ हँसि-हँसि के कहऽता
कि एही दीयर में बा
एही का खेत के एगो छोट-मोट टुकड़ी
जवन ई देखले नइखे।


– पदारथलाल की गली, वासलीगंज, मिर्जापुर (उ0प्र0)

Advertisements