– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

ललछौंहा कवनों फोड़ा
टीसत रहे
कुलबुलात रहलें
चोरी चुपके परजीवी कृमि
चीरा लगते
अंउजाइल
बहरियाए लगलें ।

तीखर घामे दँवकल
भीत जुड़ाले
पेटे पेट अदहन अस
भइल बात
कबो ना सिराले
मुँह से लार अस
टपक जाले ।

पजरे क परतीत
साँच ना होले
मनई बहरूपिया अस
स्वांग रचेला
समने अलगा
पाछे अलगा बांचेला
महाभारत ।

दूभर होला
मीठ बोलवा के चिन्हल
जानल पहिचान्हल
डोड़हा लेखा
दुमुंहा कीरा
कब डँसी आ केहर डँसी
पता ना चले ।

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