– दुर्गा चरण पाण्डेय

(१)

आपन बिपत

साठ साल के भइल उमर बानी परेसान कचहरी से.
रोज रोज होला झगड़ा सुतहीं के बेरा मेहरी से.
लइका ह त पइसा खातिर मुड़िए पर मेड़राइल बा.
साहु जी साइकिल छिन के रखलें,
कुबड़ी के खाँसी जोड़िआइल बा.

कउआ करे काँव-काँव, लागता कवनो आई.
कइसे कटी पूस के रतिया नइखे घर में रजाई.
खटिया के ओरचन टूट गइल मोर करमवा फूटल बा.
भँइस उत्पात मचवलस ओकर पगहा कहीए से टूटल बा.
हे भगवान ! हम कहाँ जाईं, खाली बाटे डेहरी.
साड़ी खातिर मुँह फुलावे, मिलल करकसा मेहरी.

सोचनी कि बकरी बेंचि के मड़ई के टाट बन्हाईं.
सियरा दबवलसि नटिका त मरि गइल कहि के माई माई.
पियलस ताड़ी छोटका भाई जोरू जमीन रखलस बान्हे.
ओकरो लइकन के अब हमहीं ढोअतानी अपने कान्हे.
हे भगवान! अब का-का विपति हमरे माथे बजड़ी.
मन त करता बन जाईं साधु, लेलीं हांथ में खंजड़ी.

गगरी में हम रखले रहनी खेतन के खतियान.
मुस घूस के जाने कइसे कई देहलस हेवान.
एहि से वकील के पाछे दिन-दिन भर घूरिआईं.
साहेब लोग कहेला पहिले पाकिट मोर गरमाईं.
हमके मत दीं, ऊपर चाहीं, बड़ी घुसखोरी बा आइल.
केतनो चूसेला तब्बो ऊ पइसा खातिर रहे खखाइल.

घरहूँ लछमी बनहूँ लछमी, लछमी के महमारी.
लछमी बिना काम ना होई प्राइवेट भा सरकारी.
अब रउए ना हमके कवनो सही डगर बताईं.
चारू ओर भूतन के पहरा कवने रहिया जाईं.
आपन का-का विपत सुनाई, आपन का-का विपत सुनाई.

(२)

भारत के किसान

उतरल पगड़ी, पाँव बेवाई.
करजा भरते, जाय कमाई
सुनऽ ए भाई हमहूँ इनसान हईं.
भारत के अभागा किसान हईं.

देहीं पर ना कपड़ा, डेहरी बा खाली
बान्हे गहना रूसल घरवाली.
लइका के पइसा कइसे दिआई,
लड़की कुआंर बाबू करे पढाई.
बरसल सावन , बढ़ल मंहंगाई.
धान दहल अउर गइया बिकाइल.
हम गरीबी के ठोस परमान हईं.
भारत के अभागा किसान हईं.

जेकरा दम पर, राज समाज बा
अन्न-दाना के उहे मोहताज बा.
आँख में ना पानी बा सरकार के,
चूसेला खून देखिं बिबस-लाचार के.
नीति जो इहे रही सरकारी,
पड़ी अकाल अउरी बढ़ी महामारी.
हम झूठा ना तनिक बेइमान हईं.
भारत के अभागा किसान हईं.


परिचय :
गोपालगंज जिला के पंचदेवरी प्रखंड के एगो छोटहन गाँव कुइसा भठवाँ में जनमल. हिंदी से एम.ए., बी.एड. आ पी. एच.डी. के योग्यताधारी ई पंचदेवरीए में शिक्षा के अलख जगावे खातीर एगो ‘टॉपर्स एकेडमी’ नाम के स्कूल के निदेशक हउएँ. साथह कई गो अखबारन से प्रत्रकारिता के माध्यम से जुड़ल बाड़न.

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