पारंपरिक निरगुन

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’

JaiKantSighJai
(1)

के रे जनम दिहलें, के रे करम लिखलें
कवन राजा आगम जनावेलें हो राम ।।

ब्रम्हाजी जनम दिहलें, उहे रे करम लिखलें,
जम राजा आगम जनावेलें हो राम।।

माई-बाप घेरले बाड़े मुँहवा निरेखत बाड़ें
हंस के उड़लका केहू ना देखेलें हो राम।।

हंसराज उड़ल जालें मंदिर निरेखत जालें
एही रे मंदिरवा अगिया लागिनु हो राम।।

एही रे मंदिरवा में कता सुख पवनीं हो
ओही रे मंदिरवा अगिया लागेला हो राम।।


(2)

सगरी उमिरिया सिराइल हो,
हमरा कुछो ना बुझाइल।

जोतत कोरत, बोअत काटत,
सब दिन रात ओराइल हो।। हमरा….

कुटत पीसत, बाँटत भोगत,
अबले ना अधम अघाइल हो।। हमरा-

हीरा रतन धन साधु ले अइलें,
हाय, मोरा कुछु ना किनाइल हो।। हमरा….

लोग कहे अब पार उतर जा,
हम तीरे ठार्हे लजाइल हो ।। हमरा…


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