पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 4थी प्रस्तुति

– ‍हीरालाल ‘हीरा’

अकसर एके संगे खइले
सँगे मदरसा पढ़हू गइले
एक्के अँगना खेलत-कूदत
दिन-दिन बढ़ल उमिरिया रे।
दू भई का नेह क चरचा
सगरो गाँव नगरिया रे ।

भव भरल भटकाव न कवनो
निश्छल हिया, दुराव न कवनो
घरनी अवते एह लोगन के
लउकत तंग नजरिया रे!
माई-बाबू आन हो गइल
प्रान बसे ससुररिया रे !

आपुस में तकरार बढ़ि गइल
बात-बात में रार बढ़ि गइल
अँगना दुअरा लगल बँटाये
पहुँचल पंच दुअरिया रे !
माई-बाबू के के राखी
अजब भइल तकररिया रे !

स्वारथ में अस आन्हर भइले
नेह तूरि हिय पाथर कइले
केहू के घर रूखा-सूखा
केनियो घीव चभोरिया रे !
एक घरे जगमग दीवाली
दुसरा घरे अन्हरिया रे !


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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One thought on “प्रान बसे ससुररिया रे !”
  1. एक घरे जगमग दीवाली
    दुसरा घरे अन्हरिया रे !
    दिल बाग-बाग हो गइल हमारो
    सुनिके राउर बंसुरिया रे !!
    वाह! वाह !.
    ओ.पी .अमृतांशु

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