फागुन के तीन गो गीत

Ram Raksha Mishra Vimal

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

एक

लागेला रस में बोथाइल परनवा
ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे !

धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा
बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा
इठलाले पाके जवानी अँजोरिया
गावेला पात पात प्रीत के बिहाग रे.

पियरी पहिरि झूमे सरसो बधरिया
पछुआ उड़ा देले सुधि के चदरिया
पिऊ पिऊ पिहकेला पागल पपिहरा
कुहुकेले कोइलिया पंचम के राग रे.

मधुआ चुआवेले मातल मोजरिया
भरमेला सब केहू छबि का बजरिया
भींजेले रंग आ अबीर से चुनरिया
गोरिया बुतावेलिन हियरा के आग रे |

दू

फागुन के आसे
होखे लह लह बिरवाई.

डर ना लागी
बाबा के नवकी बकुली से
अङना दमकी
बबुनी के नन्हकी टिकुली से
कनिया पेन्हि बिअहुती
कउआ के उचराई.

बुढ़वो जोबन राग अलापी
ली अङड़ाई
चशमो के ऊपर
भउजी काजर लगवाई
बुनिया जइसन रसगर
हो जाई मरिचाई.

छउकी आम बने खातिर
अकुलात टिकोरा
दुलहिन मारी आँखि
बोलाई बलम इकोरा
जिनिगी नेह भरल नदिया में
रोज नहाई.

तीन

असो जाए फगुनवा ना बाँव सजना
कुछो हो जाए अइह तू गाँव सजना.

काल्हु बुधनी के डेगे ना हेठा परे
ओहके फुरसत ना हमरा से बातो करे
ओकर दुलहा जे पाती पेठवले रहल
संग रङ आ अबीरो भेजवले रहल
बा बढ़ल ओकर टोला में भाव सजना.

असो छवरी के अमवो बा मोजरा गइल
पिछुवरिया के कनइलवो कोंढ़िया गइल
रोज गाके कोइलिया डोलावेले मन
तोहसे मीले के सपना देखावे सजन
कान तरसेला सूने के नाँव सजना.

रोज रोटी आ दूधे कटोरा भरीं
तनी उचरऽ ए कागा निहोरा करीं
आँखि पथराइल देखे में रहिया पिया
केहू बूझे दरद ना विमल के हिया
लागे केकरो ना बोली सोहाँव सजना.

हो गइल दिन बहुत रंग खेलल पिया
मुसकराइल हँसल अउर चहकल पिया
अबकियो जो ना अइबऽ त कइसे जियबि
कइसे तोहरा बिना हम ससुरवा रहबि
तोहरा बिन लागे घरवा उबाँव सजना.

(कवि के प्रकाशित काव्य-संग्रह “फगुआ के पहरा” से)

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1 Comment

  1. Fagua ke pahara pe Faguah Ke teen go geet dekh ke mann prassan ho gayiel..

    raur aisahi geet post karal kareb aur humni ke naya naya geet padhe ke mauka dihal kareb.. ehi umeed me… Faguah ke Sarrarararararararararar..

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