– मनोज भावुक

(१)
सर से हाथ हटा के देखीं , हाथ-पैर चला के देखीं,
कुछ ना कुछ रस्ता निकली,बुद्धि के दउरा के देखीं

पहिले त उठ्ठीं-जागीं, फिर आलस के कंबल फेकीं
मन जरूर फरहर होई, दाढ़ी बाल बनवा के देखीं

दूध के धोवल केहू नइखे ,सब हमाम में नंगा बा
जादा ना बस एक महीना के अख़बार उठा के देखीं

बीट करेला कउवा सरवा महादेव के ऊपर भी
ना यकीन होखे त रउरा मंदिर -मंदिर जाके देखीं

बइठल-बइठल मत सोचीं, अरे गिर-गिर के चलले बा सब
मंजिल नियरा लउके लागी, बस एक क़दम बढ़ा के देखीं

जेकर नाम भइल बा ओकरा पीछे कुकुर पड़ल बाटे
सब नामी लोगन के रउरा बस इतिहास उठा के देखीं

सबकर जिनगी उपन्यास ह, सबकर जिनगी नाटक ह
रउरो अपना जिनगी के सब पन्ना के सरिया के देखीं

‘भावुक’ मन के मार-मार के मत खुद के कमजोर करीं
भूल भइल जे भूल से ओह अनुभव के ज्ञान बना के देखीं


(२)

गोबरे गणेश बा इहां
अब उहे विशेष बा इहां.

बा कहां इहां प आदमी,
आदमी के भेष बा इहां.

जानवर में प्रेम बा मगर
आदमी में द्वेष बा इहां.

यार तू संभल-संभल चलs
डेगे-डेगे ठेस बा इहां.

जिंदगी अगर हs जेल तs
हर केहू प केस बा इहां

बा कहां प जिंदगी ‘मनोज’
आदमी के रेस बा इहां

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