(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 10वी प्रस्तुति)

– गंगा प्रसाद अरुण

नानी हो,
बहुते इयाद आवेला तोहार
खास करके तब
जबकि पापा-मम्मी दूनो लोग
चलि जाला अपना-अपना आफिस-स्कूल
बन कइके हमनी के ताला में.
जानेलू, घर में कबो-कबो
आ जालें स नेउर-बिलाई
आ डेरा जाइले हमनी दूनो बहिन-भाई
दादी घरे रहिती त ना नूँ होइत अइसन !

नानी हो,
बड़ी मानेले रिंकिया के, ओकर दादी
सँच के राखेले ओकरा खातिर
मर-मिठाई, पाहुर-परसादी
खूबे प्यार करेले, साज-सिंगार करेले
गोड़ रंगेले, पाउडर-बिन्दी लगा देले
आ सजा देले ओकरा के गुड़िया अइसन
जइसे तू करत रहलू हमरा के.
परेशान हो जाले ओकरा बर-बेरामी में
काढ़ा-दवाई देबेले, खिआवेले-पिआवेले
आँचर ओढ़ावेले, गोदी में छिपावेले
कहानी सुनावेले तोहरे अइसन –

नानी हो,
तोहरे एकबाल से त हमनी के
सकलीं निहार ई संसार
खटपरू मम्मी के तूही त बनलू सहारा
महीनवन कइलू ओकर देखभल
दवा-बीरो, धेआन
तबे त बाँचल ओकर परान
आ देख पवलीं हमनी तोहरे कोरा
एह दुनिया के अँजोरा !

नानी हो,
बतावेलन पापा कि ना रहती तोहार नानी
त भइयो एह दुनिया में ना आइत
दादी-फुआ त बस देखत रहली
मम्मी के घरसे बहरिआवे के घरी-साइत !
का दो बाँझ हीयऽ, संतान से घर का सजाई
पापा के दोसर बिआह कर दिआई
बाकिर, तू कुल्हि सम्हार लिहलू
अशक्त-अलचार मम्मी के सेवा से
आ हमनी के जिनिगी के जतन-हुलास से
तूं ही त बचवलू हमनी के
दियरी के टेम्ही अस काल के बतास से !

नानी हो,
दादी के गुन का गाईं
कुछो सुख त ना जनलीं जा बहिन-भई
ऊ जइसे बिसमाध जाली हमनी के देखते
आ लागल रहेली खाली फूए के संतान सँवारे में
सँवारे से जादे बिगाड़े में !
टाँफी-बिस्कुट-लकठो-चना-चबेना
चुपे चोरी थम्हा देली अपना नाती-नातिन के
आ ताकते रह जालीं जा हमनी पोता-पोती
जइसे हमनी के कुछ हइये नइखीं उनका नजर में !
काल्हुए ओह कुल्हिन के नहववलीं-धोअवली
चानी पर चुरूआ भर चमेली के तेल चँपली
कपड़ा-लाता कचरली
आ छिनिया देली हमार एगो चड्डी !

नानी हो,
खोजत रहीला हम अपना दादी में
तोहरे अइसन नेह-छोह, माया-छाया
तबे नू भइया बोलत रहे एक दिन नाना से –
– ”नानाजी, नानाजी, हमार दादी मू गइल“
का फरक परत बा अइसन दादी के
भइल, ना भइल ?

नानी हो,
ना करत रहे तोहरा पास से आवे कें मन
बाकिर, आवे के परल मम्मी के साथ मजबूरन
लोगन के टोका-टोकी से –
– ”कहवाँ पढ़ेलू ?“- ”कब नाँव लिखाइल ?“
– ”ना पढ़बू त का बकरी चरइबू ?“ हम का कहीं ?
अइसे अपना उमिर के कवनो बच्चा से
कुछ जादहीं सिखले-जनले बानीं
रंग-अच्छर ज्ञान, गीत, कविता-कहानी.

नानी हो,
अबहीं हमार उमिरे का बा ?
तबो हम पढ़ब, खूब पढ़ब, आगे बढ़ब !
बाकिर, जब दादी बनब त अपना पोता-पोती के
प्यार करब, प्यार करे सिखाइब खूब जानब-मानब
‘हमरा दादी अस कोई के दादी जनि होखे’
भगवान से बस इहे मनाइब-गोहराइब !


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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