राजीव उपाध्याय के तीन गो कविता

RajeevUpadhyay
(1)
मन के चाकरी

मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी
अब का करीं, हमके अब त बता द।
मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी॥

एने.ओने जानी, कुछू ना बुझाला,
हवे ई ओसारा कि ह ई सिवाला।
मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी॥

खेत हवे कि बारी, कि गाँव के दुआर,
नदिओ ना जाला, नाहीं घरे के इनार।
मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी॥

दिन कब आवेला, सांझ कब जाले,
नाहीं बुझाला, काँहे गईया रम्भाले।
मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी॥

जेठ के दुपहरी काँहे, काँहे हो आषाढ़,
कहे ले का शीतिया माघे, कहे का कुआर।
मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी॥

(2)
होई जाई सून सब गउवाँ-जवार

छोड़ि के कहां चललऽ घरवा दुवार
होई जाई सून सब गउवाँ-जवार॥

जहाँ जात बाड़, उहाँ कुछू ना भेटाई,
पर बिना तोहरा इहाँ होईहें अकाज॥
जहिया तू कमइब तहिए बस खइब,
सूतब त सूता पड़ी, होइब खराब॥
छोड़ि के कहां चललऽ घरवा दुवार
होई जाई सून सब गउवाँ-जवार॥

जहिया ना खबर आई भइया तोहार,
माई.बाप रोई, भउजी होईहें बेहाल।
अबो त लवटि आवऽ गंगा कछार,
बहुते धइले बा, ईहाँ गउवाँ के ताल॥
छोड़ि के कहां चललऽ घरवा दुवार
होई जाई सून सब गउवाँ-जवार॥

(3)
गवन ले जइहऽ

गवन ले जइहऽ, अबहीं त उमिरिया बावे काँच
दिन कुछु छोड़ि द, सीखे के बावे सब बात॥
गवन ले जइहऽ॥

ससुरा के उँच-नीच अबहीं ना बुझाई
आँगन देखि-देखि मन ललचाई
दिनवा भेजइह बादे, नऊआ के हाथ॥
गवन ले जइहऽ॥

अबहीं ना आवे चुल्हा फूंके हमरा
गोईंठा जराइब कइसे,
अउरी लकड़ी होई बेहाथ॥
गवन ले जइहऽ॥

तोहरी मईया के बात ना बुझाई
अउरी ननदो रिगइहें,
डर बा कि हमसे हो जाई बात बेबात॥
गवन ले जइहऽ॥


संपर्क-सूत्र :

राजीव उपाध्याय,
एम बी ए, पी एच डी (अध्ययनरत)
बाराबाँध, बलिया (उत्तर प्रदेश)

इमेल – rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष – 7503628659

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