– डॉ अशोक द्विवेदी


लोकभाषा में रचल साहित्य का भाव भूमि से जुड़े आ ओकरा संवेदन-स्थिति में पहुँचे खातिर,लोके का मनोभूमि पर उतरे के परेला। लोक कविताई के सौन्दर्यशास्त्र समझे खातिर लोकजीवन के संस्कृति, लोकदृष्टि ओकरा अनुभव-सिद्ध मान्यता आ संवेदन-ज्ञान के समझल जरूरी बा। अक्सरहा एघरी,कुछ लोग भोजपुरी साहित्य आ ओकरा कविताई के अपना विचार दर्शन, अपना रुचि -पूर्वग्रह आ जानल सुनल राजनीतिक-समाजिक अवधारणा आदि का सुबिधानुसार देखे,जाने आ आँके के कोसिस का साथ मूल्यांकनो करत लउकत बा। अपना निजी सोच, बिचार-दर्शन में ऊ लोग भोजपुरिये ना, कवनो भाषा-साहित्य के अरथवान सिरजनशीलता के, ओकरा पूर्णता में समझला के बजाय, ओकरा सँग अन्याये करी। जेकरा, कविता के सही पाठ करे ना आई, ऊ भला ओकरा मरम के का समुझी? लोकभाषा के आपन ठेठ ठाट आ ब्यंजक-शक्ति होले, जवना के चलते ओकरा जियतार अभिव्यक्ति में हृदय-संवाद के आत्मीय सांकेतिक-छुवन, पढ़वइया-सुनवइया के ओकरा प्रेषित अर्थ से जोड़ेले। एकरो खातिर ‘ग्रहणशीलता’ आ ‘समझदारी’ जरूरी बा ।

एम्मे कवनो शक नइखे कि कविता का समय-सन्दर्भ में, रचनाकार का संवेदन आ काव्यानुभूति तक पहुँचे आ ओके समझे खातिर इतिहासबोध आ समाजिक-सन्दर्भो के जानकारी होखे के चाहीं, बाकिर खाली ओतने से कविता के समग्र आकलन हो जाय ,ई जरूरी नइखे । कबिता के उपादान ,समय का साँच का मोताबिक बदलत रहेला। जीवन अवस्था, विचारधारा आ अभिव्यक्ति के लूर-ढंग ओकरा रचना-विधान में सहायक होला, तब्बो ओकर कवनो बान्हल सीमा नइखे, जवना पर कविता क — लोकभाषा का कविता के – संपूर्ण मूल्यांकन हो जाय । कारन कि एकरा बदे कवनो एकही ‘परफेक्ट’ कसौटी नइखे।

कल्पनाप्रसूत, बनावटी काव्यानुभूति आ कवनो खास सिद्धान्त पर रचल जाये वाली कविता समय का मोताबिक नया हो सकेले बाकि मौलिक संवेदन का अभाव में, सुभाविक ना रहला से बनावटी कविताई कहाई । एही तरे छन्द, बन्दिश, शैली, साँचा ई कूल्हि कविता के देह-धजा के अंग हो सकेला, आत्मा ना ! भाषिक बिनावट में, कवि के संवेदना आ जियतार अनुभूति प्रान फूँकेले, तब कविता क जियत-संसार परतच्छ होला। एही से कविता व्यक्तिगत रुचि-अरुचि, संस्कार-बिचार ,आ कवनो खास नजरिया से ना नपाय । कविता क स्थायी मानको, ओके समझे समझावे में कामे आ सकेला, बाकि कबो-कबो, कवनो कवनो कविता के समग्र आकलन में ऊहो पूरा ना परे।

कवनो असाधारन अभिव्यक्ति जवन मर्म छूवेले, ओकर सन्दर्भो माने राखेला । मानवी मूल्य के उजागर करे वाली अरथवान अभिव्यक्ति खातिर सुघर भाषाई बिनावट रचनाकार का कौशल आ काव्य-विवेक के प्रमान होला । समालोचक में ‘समझ’ का साथ अनुभव-ज्ञान सिद्ध सामरथो चाहीं, जवना बले ऊ विषय-वस्तु (कन्टेन्ट) के साथ रूप (फार्म) में भाषाई रचाव (टेक्श्चर) क संगति-असंगति देख सको । ओके ईहो देखे के परी कि कवि का परोसल जथारथ में जीवन-सत्य आ मानवीयता के कतना जियतार उपयोग भइल बा आ कवि ओह जीवन-सत्य के केतना सूक्ष्मता आ सचाई से उपयोग कइले बा ?

मानवीय करुना ,संवेदन के रचनात्मक गति आ रूप देले। अद्वितीयता का सँगे कवि में समाजिकतो जरूरी बा, जवन मानव-जीवन के उठावे में आवश्यक होला आ मानवीय अनुभवन के विवेकसम्मत वक्तव्य देबे में कवि के सहायक बनेला । हिन्दी के चर्चित कवि मुक्तिबोध के शब्द उधार लेके कहीं त कविता आत्मपरक अभिव्यक्ति होइयो के, व्यक्तिसापेक्ष, जीवन-सापेक्ष्य, युग सापेक्ष्य होले । कवि के अनुभूति जब छीछिल होई, त भाषा के नया, ताजा आ कलात्मक प्रयोगो बेमाने होई । एही सब का चलते, समीक्षक/समालोचक क काम रचनाकारो ले ढेर तन्मयता भरल, सिरजशील आ कठिन होला।

बात करत रहीं लोकभाषा का कविताई पर, आ करे लगनी समझ बूझ, आकलन, मूल्यांकन के। असल में एने, हमके हिन्दी के कुछ संगी साथियन क इयाद आ गइल हा, जवन लोग, अचके भोजपुरी का गत-दुरगति में लागल बा । ओम्मे कुछ कथित समाजशास्त्रियो बुद्धिजीवी बा लोग । ऊ लोग भोजपुरी कविताई आ साहित्य के खाक बूझो भा मत बूझो, बाकिर अपना खास वैचारिक लकड़पेंच, गिरोहबन्दी आ नव-नटकला से नोकसान जरूर कर रहल बा लोग । अइसना महानुभावन क, कई कई ‘वाद’ के खट-मिठ अनुभव आ जान-पहिचान बा । समाजवाद, विकासवाद, जनवाद, दलित-शोषितवाद, स्त्रीवाद जइसन कतने कड़ुवा कसैला भेदभावी वाद बा, जवना का बसियाइल भरम-जाल में ऊ लोग भोजपुरियो कविता के चीन्हे-जाने लागल बा लोग। ए चिन्हला-जनला में, भोजपुरी कविता क बहुत कुछ नीमन, ग्राह्य, सार्थक आ मूल्यवान छूट जाये क डर बा।

अरे भाई ,लोक के कविता त करुना, प्रेम आ पीर क कविता हऽ। ओम्मे प्रतिरोधो बा, त ओकर तेवर तीखा ना हो के, हिया के हूले वाला बा। ओम्मे आत्मसंघर्ष के कतने रूप, रंग बा। नियति क मार आ श्रम-साधना का बीचे उत्सवन क हास हुलास आ संस्कृति क राग-रंग बा। हमन सब जानत बानी जा कि लोकगीतन में केतना विविधता भरल बा – जियत-जागत संसार लेखा। एगो पूरा जीवन-चक्र समेटेले । ओमें भक्ति का साथ, निस्सारता क निरगुनो बा। दरसल लोक कविताई कुछ अइसन बा, जवना में बिचार सिद्धान्त जइसन ऊपर से कुछ लादल नइखे। कुछ कहाइल बा, कुछ अनकह जानबूझ के छोड़ दिहल गइल बा। ऊहो एह गरज से कि ‘थोरे लिखना, ज्यादा समझना’। अब ई पढ़े-सुने वाला पर छोड़ दिहल बा कि ऊ ओके पूरा समझ लेव! ई तऽ पढ़े-लिखे वाला लोगन पर बा कि ओह लोग में ग्रहणशीलता, समझ आ विवेक के कवन स्तर बा ! भोजपुरी कविता क उत्स एही लोक कविताई में बा, ओकरा लय-धुन-राग के छोड़ल, परम्परा विच्छेद कहाई। एही तरे लोक के ऊ समाजो ना छूटी, जवना में पारस्परिकता आ सामूहिकता से लसल घर-गिरस्थी, खेत-खरिहान,पशु-पंछी, ताल-पोखर, नदी-पहाड़ बा। भोजपुरी कविता के समझे खातिर ओकरे भाव-भूइँ पर उतरे के परी आ परदेसी मानक के बजाय, ओकरे मानक अपनावे के परी ।

(भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका पाती के जनवरी 2017 अंक से साभार)

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