शिलीमुख के कबिताई

– शिलीमुख

shilimukh

जेकरा पर बा तोहके नाज
ओकरे से बा बिगरत काज !
अँइचा के ऊजर ना लउके
आन्हर के सूघर ना लउके
सब बाउर, नीमन कुछ नाहीं
ओकरा के बस गद्दी चाहीं
जाति-बरग में भेद बढ़ा के
सुबिधा-शक्ति-अफीम चटा के
जतना चाही लूटी खाई
खुरचुन के परसाद खियाई।
पुहुत दर पुहुत ओकरे राज!
गद्दी छिनते भइल नराज !!

रहि- रहि रोज रसाई छेरे
फइलावत दुर्गन्ध घनेरे
धिक् इरिखा, धिक् धिक् अन्हरउटी
धिक् ओकर दूमुँहाँ कसउटी
खन तोला ,खन माशा- रत्ती
अगरु-धुआँ के बारे बत्ती
टुकी -टुकी में तन्त्र बाँटि के
बार जोगावे माथ काटि के
चिरइन पर जस झपटे बाज !
ओइसे ताक में लउके आज !!

कुछ बिखधर बक्ता उपरवलस
इनिके कुछ उनके उसकवलस
जहवाँ लउके खर भा पुअरा
लुत्ती लेसे पहुँचे दुअरा
आगि लेसि फिर-फिर चिचियाय
हेली-मेली ले फोंफियाय
खन जलूस, खन नाराबाजी
थेथर मतिन करे लफ्फाजी
हाय -हाय बँट गइल समाज !
हाय – हाय छिन गइल सुराज !!

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