सात पुहुत के उखड़ गइल खूँटा

– बलभद्र

balbhadra
सात पुहुत के उखड़ गइल खूँटा
बेंचा गइलें स बैल
दुआर कुछ दिन रहल उदास
बाकिर सन्तोषो ई कम ना रहल
कि अतना जोतइला के बादो
निकल गइल दाम
गहँकी अइलें स
तय भइल दाम
धरा देल गइल पगहा
पगहा धरावत
दाम धरत
माथ पर गमछा धइल ना परल भोर
रिटायर होत समय चाचा
सोचलें आ सोचल आपन
सगरो गवलें
कि रहब गाँवे
खेत-बधार घूमब
रिटायर भइला के
साले-दू साल बाद
बँटा गइल घर
चूल्हा-चउका फरिया गइल
गुमसुम रहे लगलें चाचा
एह गुमसुमी के लागल
कतने माने-मतलब
कबो अन्हारें
कबो दुपहरिये
निकल जास टहरे
धीरे शुरू करें चले
आ ना जाने कब
चाल उनकर हो जाए तेज
दस मिनट के दूरी
तै हो जाए पाँचे मिनट में
चाह चाहीं
बाकिर ना मिले ओह में सवाद
माई से बतियावें
बाकिर बात ना कवनो बात जइसन
ना बइठ पावें कतो असथिर
ना टिक पावें कवनो बात पर
दुआर पर खटिया पर परल रहें खरहरे
बल देके कहल चाहें कवनो बात
आ पूरा ना कहि पावें
बँटवारा के लेके
कबो कवनो गंभीर बात ना कहलें चाचा
गहँकी जब हँकले स बैलन के
बैल हुमचले स एक बेर नाद देने भरजोर
एह दुआर पर
बैलन के ई आखिरी जोड़ी रहल
ई आखिरी हुमाच
बेमारी के हालत में
फोन पर चाचा कहलें अपना भइया से
कि आवल चाहत बानी तहरा भीरी
आ रोवे ऊ लगलें
ई उनकर आखिरी रोआई रहल
उनकर आखिरी हुमास
सात पुहुत के उखड़ गइल खूँटा
बेंचा गइलें स बैल।
(भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका ‘पाती के 78 वां अंक’ से साभार)


हिन्दी विभाग, गिरीडीह कालेज,
गिरिडीह-815302 झारखंड

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