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महानगरन में रहे आ जिये वाला हिन्दी, अंग्रेजी के कुछ कवि आलोचक अपना सुविधा आ समझ का अनुसार ,कवनो अवसर पर ‘लोक‘, ‘लोकजीवन‘ आ संस्कृति के बात करेला आ मन मुताबिक अपना खास नजरिया से ओकर इस्तेमालो अपना भासन में करेला.

लोकभाषा में वाचिक भा सिरजल-लिखित साहित्य के आधुनिक आलोचक दृष्टि से देखे क मतलब ई ना होला कि ओके ओकरा मूल समय-सन्दर्भ आ परिवेश से काट दिहल जाव. भोजपुरी भा कवनो लोक भाषा के कवि, तमाम बदलाव का बादो, अगर केहूँ, तरे अपना ओक आ जीवन-संस्कृति से आत्मिक रूप से जुड़ल बा; त खेत-बारी, ताल-तलैया, नदी-पहाड़, बन-बनस्पति से विलग ना होई. अइसहीं ऊ, महानगरन में शहरी ढंग से जिये वाला कवि आलोचक लेखा, गाँव-देहात के ऋतुचक्र, उत्सवधर्मिता आ संवेदनशीलता का प्रति निठोठ-बौद्धिक, कठकरेज आ उदासीन ना होई.

अगर शहरी-महानगरी कवि के भोजपुरी कविता आ साहित्य खाली ‘वेदर रिपोर्ट’ लागी त भोजपुरी भा दोसर लोकभाषाई गँवई कवि के, शहरी-महानगरी कविता बौद्धिक, बनावटी शुष्क आ संवेदनहीन काहें ना लागी? कविता में विचार समाए भर आ सांकेतिक रूप में आवे तबे अच्छा बा. घटना शहर में घटेले त गाँवों देहात में घटेले. संवेदना गँवई आ शहरी दूनो के होले. दूनों के माहौल, जीवन शैली आ ढंग-ढर्रा अलग हो सकेला. अइसहीं दूनों के अभिव्यक्तियो अपना समय-सन्दर्भ में, अपना अपना खासियत का साथे होई. सुभाविक आ बनावटी के पहिचान समझदार पाठक क लेला.

कुछ कवि-आलोचक लोगन का एतराज बा कि भोजपुरी कवि प्रकृति, ऋतुचक्र का अनुसार बदलत मौसम के ‘कविता’ से बहरियावत काहें नइखे ? एही तरे ई लोग अपना साहित्य में खाली ‘गाँवे‘ कस्बा के नापत काहें रहि जाता ? एह लोग का जानकारी में इहे बा कि भोजपुरी में मजिगर गद्य लिखाते नइखे. खैर….. भोजपुरी गद्य भा निबन्ध- साहित्य भोजपुरी पढ़े-लिखे वालन के पता होई, एह लोगन का ओतना पता नइखे, ना ऊ लोग भोजपुरी में गद्य लिखते पढ़त बा.

हमके कबो-कबो इहे बुझाला कि ई लोग भोजपुरी में भले बोल-बतिया लेव, बाकि भोजपुरी पढ़ला आ लिखला का पजरा एकदमे ना जाला. ओही से जब-जब भोजपुरी प’ दया आवेला त ई लोग अपना अंग्रेजी-हिन्दी के पचल-अधपचल ज्ञान आ पढ़ाई का मोताबिक भोजपुरी साहित्य का मूल्यांकन में, अइसने मृदु बोल बोलेला. हम ए मजबूरी के बूझत, अपना भाषा पर, ओह लोग के एह ‘वत्सल’ ‘कृपा दृष्टि‘ से सब्बुर करे क आदत डाल लेले बानी.


(भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के दिसंबर १३ अंक से.)
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