– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

JaishankarDwivedi
हमरा मालूम न नीमन-बाउर,
भर दिन कलई खोलब.
हमहु बोली बोलब.

चीचरी परलका कागज लाइब,
दुअरा बईठ के किरिया खाइब,
मंच पर चढ़के दांत चियारब,
जी भर माइक तोड़ब.
हमहु बोली बोलब.

बिन गिनती हम पाला बदलब,
हर दम साधब आपन मतलब.
बुड्बकन के बांटब पाहुर,
भर मन माहुर घोलब.
हमहु बोली बोलब.

बिन बतकही के छेड़ब तान,
भरब जेब हम सांझ बिहान.
भाषण अनसन आउर प्रदर्शन,
भर दिन तख्ती लेके डोलब.
हमहु बोली बोलब.

बिन सोचे आरोप लगाइब,
घोंट घांट के कसमों खाइब.
पब्लिक के बहकाइब निस दिन,
खाली डालरे तोलब.
हमहु बोली बोलब.

आज बोलाइब काल्ह भगाइब,
मंहगियों के भाग जगाइब.
गुटका के परमिसन दे,
हम सभकर जेब टटोलब.
हमहु बोली बोलब.

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