– भगवती प्रसाद द्विवेदी

सोगहग लवटब हम
तहरा लगे / तहरा में

जइसे लवटेले स पखेरू डैना फड़फड़ावत
चहचहात ठोर चुँगियावत
अपना खोंता में

जइसे लगहर गाय के थान से सटल
मुँह मारत बछरू लवटेला
नाँद आ खूँटा का लगे

जइसे लवटेलीं स बिल में
गुर के भेली आ
सातू के सोन्ह सवाद चीखत
कतारबद्ध चिउँटी

जइसे लवटेले नइहर में
दूधे नहाइल, पूते फरल फुलाइल
ससुरइतिन बेटी
ढेर उलाहना, आशीष, लोर के भागीरथी
अउर ना जाने का-का बटोरे का गरज से

जइसे लवटि आवेला
गदरा के, पाकि के, फाटि के, छिंटा के
बीया
उर्वरा धरती के गरभ में समाए खातिर
फेरु से अँकुराए खातिर

हमहुँ लवटि आइब
सोगहग तहरा में समाए का गरज से
आपन भुलाइल सब किछू पावे खातिर
फेरू से अँकुराए खातिर

हम लवटब उलटे पाँव
जरूर लवटब सोगहगे
हमार गाँव!


बचपने से साहित्य सर्जना में विशेष अभिरुचि. हिन्दी भोजपुरी में समान अधिकार से अनवरत सृजन आ देश के तमाम प्रतिष्ठित पत्र पत्रिका में प्रकाशित आ दूरदर्शन के विभिन्न केन्द्रन से प्रसारित.

प्रस्तुत कविता कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी जी के प्रकाशित कविता संग्रह जौ-जौ आगर से

कवि से संपर्क करे खातिर मोबाइल नं 09430600958

One thought on “हमार सोगहग वापसी”
  1. राउर शब्द के समुन्दर से ,
    चुन – चुन के मोती .

    नथिया गढाईब माँगटिका,
    भाव के अंखिया बीछवले बनी
    आजा जल्दी से घरे लेके छुटी.
    राउर शब्द के समुन्दर से ,
    चुन – चुन के मोती .
    द्विवेदी जी के सादर प्रणाम करत बनी .

    गीतकार
    ओ.पी अमृतांशु

कुछ त कहीं...

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