भोजपुरी साहित्य के धरोहर हऽ – रमबोला

– हरेन्द्र हिमकर

HarindraHimkar

धरती के रग-रग में भइल राग
अदिमी -अदिमी हो गइल नाग
डंसलनि समाज के पोर-पोर
देहिया-देहिया में लगल आग।

अंगे-अंगे धहकल धिधोर
धरती लिहली अॅंचरा बिटोर
तब धू-धू-धू सब ओर मचल
रीसे लागल अॅंखिया करोड़।

राजा से रूस गइल रानी
होखे लागल खींचा-तानी
राजा परजा के मेल गइल
शासन कठपुतली खेल गइल।

महॅंगाई मार गइल बाजी
घर-घर में पइठ गइल पाजी
केहू केहू के ना पूछे
सब बात भइल छूँछे-छूँछे।

माया में भूल गइल भारत
घर-घर में भइल महाभारत
ओछर के बाज गइल डंका
सउंसे भारत लागे लंका।

अबरी के पेट भइल पतुहा
दुल्लम हो गइल नून सतुआ
जूठन पर जूट पड़ल कुत्ता
जनता पर टूट गइल जुत्ता।

राशन कर गइल हजम शासन
परजा के पेट भरत भाषण
टूटे लागल सब ध्यान धरम
छूटे लागल सब लाज शरम।

(2)
तब गरभे तुलसी अगुताइल
ना जनलसि बतिया ई बाइल
मइया हुलसी मनमोर भइल
बारही मास बीते आइल।

लवका लउकल बिजुरी चमकल
सब पात-पात गम-गम गमकल
बन चहक गइल चिरई जहान
बादल फूलल पानी झमकल।

चन्नन बन झूम-झूम झहरल
पनसोखा रंग पता फहरल
धरती सोहाग के इतराइल
एहवातिन के ऑंचर लहरल।

बिजुरी के फूल भरल अॅंजुरी
लवका के लहक भरल कजरी
छितराइल राग चलल चसकल
जन-गन-मन के कोंचा कसकल।

पुरवइया मार गइल कनखी
पछेया के उतर गइल सनकी
खेतन के लछिमिन घूम गइल
बाली में सोना झूम गइल।

छितनार भइल कचनार नार
रंगनार बनल आइल बहार
कोंचा-कोंचा रस मात गइल
रीसे लागल रस के फुहार।

(3)
बॉंझिन के कोख भरल चहकल
अङना दुआर मह-मह महकल
बनके चकोर सभकर चेहरा
देखेला भारत के चेहरा।

तुलसी के जनम भइल जहिया
बनचट छूटल सूझल रहिया
जन-जन के आस आकास भइल
तुलसी, तुलसी दल दी कहिया।

जनमत मइया सुरधाम गइल
हुनकर सभ काम तमाम भइल
बापो न बंस दरस पइलें
माटी-माटी सब जतन कइल।

दुध मुॅंहे मुॅंह में दॉंत भरल
मुॅंह से जय राम-राम उचरल
अचरल सभका भारी भइले
अजबे रचना बिधना कइले।

पुनिया के फल पावल चुनिया
तुलसीदल पावल ई दुनियॉं
पोसत-पालत सगेयान भइल
तुलसी दुतिया के चान भइल।

मनमउजी मन बिहरे लागल
सिखे लागल सिहरे लागल
मऊअत से जूझल भाग भइल
जम्हुआइल तुलसी जाग गइल।

धरती से धरम बिका जाला
सतवादी लोग भुला जाला
मेटे खतिरा दुख पाप-रोग
केहू धरमतमा आ जाला।

(4)
टूअर बन बिलख-बिलख घूमे
दुख लाख-लाख आगू जूमे
जरिए जे जूझ गइल जग से
हारो लगली तरवा चूमे।

टेम्हुआइल बाती टेम भइल
छरिआह बिधाता छेम भइल
नवका बिहान होखे लागल
रूपये चउअनी नेम भइल।

तुलसी चन्दा चमके लागल
मलेया गिरि से गमके लागल
सूखल बन सिहक गइल मन में
सुखके बदरा दमके लागल।

बिधना के रेखा रंग भइल
तुलसी नरहर्या संग भइल
सोना में सुन्नर गंध बसल
तुलसी मन सोती गंग भइल।

(5)
अंजुरी-अंगुरी के पोर भरल
रोऑं -रोऑं पर रंग चढ़ल
रमबोलाा आज जवान भइल
जइसे पुनिया के चान भइल।

फूलल मन काई फाट गइल
मधुआ मन मधुवन चाट गइल
गॅंवई में गुम गोसाई के
मन सिहकल दुनियॉं पाट गइल।

रतना रतनार भरल मद में
रंग-रूप चढ़ल अपना हद में
तुलसी के भइली आध अंग
भइली लगाम तुलसी-तुरंग।

रस गंध जवानी के फाटल
सिहकल बेयार भौंरा मातल
डंटी-डंटी पर फूल भइल
तुलसी-तुलसी के भूल गइल।

भूलल तन भूल गइल काया
चिन्ता छूटल, छूटल हाया
छाया अस छाप गइल मन के
चहुॅं ओर भइल माया-माया।

(6)
कुछ रोग जवानी में होला
जब आवेला घर में डोला
दुलहिनी मास भर मुस्काइ
बरमसिया दुल्हा गम खाइ।

झबिया झूमका से भरल देह
सेनूर सोहाग से बन्हल नेह
सब लाल-लाल पीअर-पीअर
सोहत सूरत मूरत नीअर।

नेही सनेह कुछ हो जाला
सुध-बुध अदिमी सब खो जाला
सब ज्ञान गाछ का फुनगी पर
जीये लागेला सुनगी पर।

छलके जब काम-कलश रग में
सिमटे दुनियॉं अॅंगुठी नग में
ऑंखिन के रंग बढ़ल होला
नहतर पर घाव चढ़ल होला।

कनखी के धार दुधारी ह
बिजुरी भरल कटारी ह
ठेकला से जीउ करछ जाइ
हीरदा में हलचल मच जाइ।

जब लगी नेह तब ना छूटी
चाहे केतनो गोला फूटी
पल के बिछोह लागी पहाड़
चिन्ता में सूखी हाड़-हाड़।

(7)
रतना के रतन जतन एतना
कर सकति रहस तुलसी जेतना
कइलें पर माया छोड़ चलल
बिन आहि-दाहि मुॅंह मोड़ चलल।

भादो मे भूत अन्हरिया में
मतवाला बादल करिया में
तुलसी के रतना छितराइल
चल दिहल पपीहरा अगुताइल।

मन के मरोर मन मुरझाइल
पारा तन के चढ़ उफन गइल
जगले तुलसी अस उफनाइल
सब ज्ञान गरत में दफन भइल।

टिसना के तिली ताड़ भइल
कसमस-कसमस सब हाड़ भइल
हीयरा के दीयरा अंखुआइल
नेतर के पानी छार भइल।

मन सुलगल तफल गइल लहकल
सहकल तुलसी एतना डॅंहकल
आगी – पानी के भेद गइल
बढ़ गइल पॉंव बहकल -बहकल।

(8)
मुर्दा-मसान आन्ही-तूफान
कामी के तरवा तर होला
रतिया होला, होला बिहान
कामी के काम पहर होला।

ओह पार रतन के रतना बा
तुलसी एहपार बिना तरनी
ऊ घर ह भूत बसेरा जवना
घर के छोड़ गइल घरनी।

करछूल करेज में घूम गइल
दिल उरल धधा के परि गइलें
झऊॅंसाइल दिल लथपथ करेज
रतना का घाट उतरि गइलें।

रतना के नइहर मेघ तीर
छुवला से पानी बरस गइल
तुलसी चातक खरकटल हीर
पानी-पानी ला तरस गइल।

ससुरार सुरा के सागर ह
डूबे से आग बुता जाला
पीअल-जीअल से आगर ह
निसुआइल से बूता जाला।

(9)
निसुआइल तुलसी झूम गइल
बड़ बिकट राहि होके उतरल
अङना में अङना गुम भइल
बाकि जतरा खूबे सुतरल।

करनीनियॉं करवट का बेरा
रतना परली भूत भाँवर में
अंगुरी-अंगुरी सब सिहर गइल
सुग-बुग से पाँव महावर में।

सपनों में अइसन ना होला
गुदगुदा गइल केहू आके
नीनिया के बदल गइल चोला
उठली रतना अस भकुआ के।

ऑंखि मलिके पसरा दिहली
जस देखत होखस लाख कोस
ऊ हउवें आकि सपना ह
टोहे लगली आपन भरोस।

सपनाइल ऑंखि, लड़ल चूअल
अॅंचरा से लाज सरक आइल
नहीरा में मान मसक बाजल
थथमाइल खीस खरक आइल।

(10)
बदले के होला भाग रेख
तब मन गंगाजल हो जाला
बहुरूपिया बिधना बदल भेष
टीपन पर पारस हो जाला।

तुलसी ठकुआइल कॅंपस गइल
रतना अस तुनक-तुनक बोलल
हहरल तुलसी-तन हदस गइल
छॅंट गइल मान, मन के डोलल।

ऊखी-बिखी लागे लागल
माया के कूहा फाट गइल
रतना उझिलत गइली गागर
तुलसी सब सागर चाट गइल।

माटी के देहि नेहि माटी
मेटि ना माटी के पियास
मरघट दुनिया, पनघट आकाश,
इहवॉं कवनो सुख के तलाश,
जिनगी के जोति जगाइ ना
जगति के भूत भगाइ ना।

जब नेहि राम से ना होई
जाये के बेरिया का होई?
कामे ना आइ ई जोई-
रोई बेटा, बेटी रोई।

जब पकड़ी जम्हु आके नेटी
केहू ना चिता संग लेटी।
ई रूप जवानी का करिहे?
ई दरस दिवानी का करिहे?

परलोक सुधारीं, खुद सुधरीं
दुनिया उधार, सउदा उधरी
छोड़ी छलचिकनी जपीं नाम
एगो मन्तर बस; राम-राम।

धरती के भूत भगावेला
आपन परलोक बनावेला
बाहर-भीतर सब राम-राम
जय राम कहीं, लेलीं सलाम।

(11)
जब परे जवानी से पाला
ना लउकेला ऊॅंचा खाला
आगा- पीछा कुछ ना सूझे
नीमन बाउर कुछ ना बूझे।

ई उमीर ठनाठन लोहा ह
गहुअन के गरभल पोआ ह
गॉंठल गुमान छाती उतान
ना सही आन ना सही बान।

जब लगी ठेस ठकुआ जाई
जरनइली कहीं भूला जाई
जब लउकी जीनगी के पहाड़
तब जोड़ लागी ताड़-ताड़।

लहरी घरनी, घहरी ताषा
गुमसुम में बिती बसमासा
मोरी-भाथी तब अपना के
दे दी मलेछ सब सपना के।

(12)
सहमल तुलसी अकुलात गात
रतना से रतना पा गइलें
कहके चल दिहलें एक बात –
आजू तुलसी सभकर भइलें।

अबला के भीतर के अबला
परमारथ के पुतली होला
नारी ह फूल लोभावेला,
अबला कचलोह कली होला।

नारी पत्थल ह, पानी ह
नारी ह आग जवानी के
जीनगी के कथा कहानी ह
चमकत सिक्का ह चानी के।

लजवन्ती जंगल झाड़ी के
छुवला से जे कुम्हिला जाला
कुहूकत कोयल बॅंसवारी के
गावत-गावत रिसिया जाला।

नारी माया ह बन्हन ह
हरताल तुतुहिया माहुर ह
नारी मलयागिरि चन्नन ह
जस नीमन ह तस बाउर ह।

तुलसी हुलसी के पूत
रतन पाके रतना से
खुलल ज्ञान के सुत
आन लागल एतना जे
चल दिहलें नरनाह।

आहि में अलख जगाके,
जीतला संसार
गीत के गन्ध लुटा के
खाके कसम करोड़
चोर मन के समुझावत
नावत सत के माथ
चित्त के शुद्ध बनावत
कन-कन में आनन्द
कन्द, फल, मूल के आशा
धुरी लगावत माथ
नाथ से लेत दिलाशा
कब होई तम-नाश?
आश लागल जन-जन के
कवि कुल के सरदार,
खड़ा हो गइलें तन के
सिहकत सुधा सुवास
हास के बजत बधावा
लावा-फरूही होत,
बढ़त काटत पछतावा
गावत सीताराम
नवावत जग के माथा
तारे ई कलिकाल
बनावे अमरीत गाथा।

(13)
अनुभव सूपा से ज्ञान रकम
फटकत गइलें चालत गइलें
भरि अॅंजुरी जगति-सीपी में
भगति-स्वाति डालत गइलें।

पढ़ल पढ़ल, गुनल – गुनल
कपड़ा बिनल रूई धूनल
धरती आकाश के अन्तर बा
गुनल में बड़का मन्तर बा।

गुनी – गुन ना गमकी तबले
गम खाई ना सुनी जबले
बड़ सासत सहत सुलभ होला
आतम का परमातम चोला।

गुन-गुन के तुलसी भइल गुनी
बइठल लहका के ज्ञान धुनी
कन-कन के कांदो काछ-काछ
रोपल रमबोला राम-गाछ।

जब ऑंख बंड़ेरी पर अंटकल
तब काया के कोआ चटकल
पपनी के पाहुन रूस गइल
मन राम-रसायन चूस गइल।

(14)
रूप, रस, राग, गंध का उपर
का बा?
किछ बा जरूर!
बाकि ऊ बउरइला से ना मिले,
मन के कहीं बान्हे के होला,
तन के त तूरही के होला।
बादल में फाटल ओह दरार के पार
का बा?
किछ बा जरूर!
बाकि ऊ अउॅंघइला से ना लउके,
तन के साधे के होला,
मन के सोधे के होला!
मन के चाह जेतना लमहर होला
ओह चाह के पार
कवनो चाह बा?
बा जरूर!

बाकि ऊ छरिअइला से ना मिले,
तन के छोड़े के होला,
मन के छेड़े के होला,
तब कहीं जाके तंत्री जागेला
आ तब लउकेला –
एह सब का पार
अपार शांति बा
जहॉं, नेहि, नेहि ना रहे
देहि, देहि ना रहे,
सब आपन होला
सब बिरान होला।

(15)
तुलसी तरनइलें तरि गइलें
धरती के अॅंचरा भरि गइलें
अक्षर-अक्षर से अरथ बढ़ल
अइसन सरधा के रास ढड़ल।

जब टुटति रहे धरम ताला
तुलसी लिहलें कंठी माला
कट गइल हिन्दुअन के फॅंसरी
अइसन तुलसी बरलें रसरी।

दोहा चउपाई छंद बंद
धरती पर मर दिहल अनंद
सोरठा कवित्त में भरल भाव
भगति-रस भरलसि गॉंव-गॉंव।

सब शास्त्रन के पाट मढ़ल
बेदन पुरान के पाल चढ़ल
तुलसी खे लइलें साध-साध
सुमति नइया बहली अबाध।

करतब से भाग फुला जाला
बिधना का बात भुला जाला
कर्त्ता करोड़ भर्त्ता एके
सबके भर देला ले-दे-के।

जे कुछ पाके इतरा जाला
ऊ कुछ खोके छितरा जाला
पावल – खोवल दस्तूर इहॉं
लेखा-जोखा भगवान किहॉं।

(16)
रतना के पसीजल रीस-खीस
ऑंखि के माड़ा फाट गइल
मरिचा के पानी परल ऑंखि
पसरल रग-रग में पाट गइल।

सिसकल मन सुसुकी पर सुसुकी
बेघल सखिया सबके उसुकी
बिरहा के आग भभक आइल
कुछ ना भावे पीअल खाइल।

भरला भादो सूखल सरेह
बिन आन्हि ऑंखि परल खेह
कॉंचे टूटल अंगूर-आम
खट्टा-खट्टा सब हाड़-चाम।

चाबुक सन छरहर भरल देहि
मुसुकी पर बरसे नेहि मेह
से सूखल भइल रहेठा सनस
मधुमासे मुरझाइल मधुवन।

सिहरत रतना बिलखात भेश
देखत तरहत्थी भाग-रेख
करतूत विधाता के कइसन
कईनी जइसन, पइनी वोइसन।

केकर कपार पर भइन वास
खींचल के मतिया के उजास
सरधा के फेरा कवन बेर
आइल कइसे एतना सबेर।

चिन्ता के चिता लगल धहके
कुछुओ ना उ गइलें कह के
कके सिंगार अब का होई
होके उघार अब का होई।

जीनगी भर के ई दाग भइल
भरले सोहाग अब आग भइल
केहू हमार पतिआइ ना
हुनका पर दोष लगाइ ना।

(17)
जात मरद के जमखानी ह
जंगल में मंगल खोजेला
ह छरिआह जलम के जाहिल
ढूंढ़ जलम के अउपाती ह।

तूरे में माहिर मनमउजी
टूटे में इस्पात कड़ाकड़
गरजे में ह मेघ आसाढ़ी
ढड़ जाला ई बात-बात पर।

नारी के कमजोरी सोना
काम मरज के कमजोरी ह
स्वारथ का गड़ही में जलमल
अधराती के बंद कमल ह।

धोखा के बादल ह करिया
माया में उमड़त छितराइल
छल के ह छरिआह बछेड़ा
पलक गिरत ओझल हो जाला।

शंका के उफनात समुन्दर
जब चाही तूफान मचाई
फाँसे में बकुला बैरागी
टीप नेहि के जल में फेंके।

टूटी तब टेसू सन टहकी
लोर चाट के गीत उरेही
डेग-डेग पर कीरिआ खाला
धीरज के धरती विशाल ह।

मोह तिलाई के मछरी ह
बिछुड़ी तड़प-तड़प मर जाइ
लाली पर लट्टू हो जाला
लोक लाज से उपर लोभी।

साँस-साँस में आश आकाशी
टूटी नेहि धरम पी लेला
आहि अंगोरा ला दम तूरी
पुनिया के पागल चकोर ह।

खटपट होई खाट छोड़ दी
बाट-बाट पर बंसी टेरी
काँचे मन में काँच गड़ी तब
तुलसी पाकल कंठी लेली।

अबला के गुन ह गम खाइल
माहुर पी-पी के मुस्काइल
रो-धो के अॅंचरा साफ कइल
जारल आपन मन, मान-मइल।

जुग-जुग से परल गाँठ मन में
नारी के नरक बना दिहलस
नारी टुटल नर निसुआइल
नारी बरसल नर पी लिहलस।

नारी के फूल कहल तुरल
नर के आदत खानदानी ह
नर का रग-रग में चिनगारी
नारी सर्बत ह पानी ह।

अबला के आह अलख होला
भरमुॅंह हॅंसेला हहरेला
जब टुटेला मन के भरोस
तब आह अॅंगोरा लहरेला।

खुद जरि के नारी जारेला
आपन पियास आपन कलेश
तब जलमेला कवनो तुलसी
रामायण सन लिहले सनेस।

असली-नकली के बनल देहि
माटी पर जामल सुख-सनेह
मरघट के मोह मेटावेला
जब समय सामने आवेला।

भवति भरोस भव तारे के
जगति से मोह उखाड़े के
मन के सब मइल उतरि जाला
जहवॉं भगति रस परि जाला।

रम गइलें राम रमा गइलें
रतना के डाह बुता गइलें
रतना के घर संसार भइल
तुलसी-माला गलहार भइल।

रतना के नेम-टेम टहकल
तुलसी के कलम अउर बहकल
मॅंहकल मह-मॅंह घर-धूप-दीया
रतना हो गइली सती-सिया।

आनी-बानी सब बीत गइल
रतना के बिरहा गीत गइल
दुनिया के निहसावल छूटल
चमकल जे भाग रहे फूटल

(18)
लइका के रिझावेला कठपुतरी
छम-छम नाचे बन्हले सुतरी
तस ब्रह्म के माया धइ पगही
नचवावे हमें जगही-जगही।

गत्तर-गत्तर निछत्तर नाचे
सब देव मुनि समहर नाचे
तुलसी नचले आ खूबे नचलें
केतना जुग के पतरा बॅंचलें।

(19)
मउनी बाबा का मठ पर के चउपाल रोज
तुलसी के राम-कथा सुने ला जम जाला
अदननन बाबा के अलाप सुन के सभकर
रोआँ सिहरेला मन के चिन्ता थम्ह जाला।

गौरी काका के मीठ राग बॅंसुरी पर के
ऊ झाल-झिलिम, ऊ ढोल-ढाक, ऊ हरमुनिया
बरिसन से गठत रहल किरतनियन के गफला
धरती से पाप भगा के पोसेला पुनिया।

सावन अजोर सतमी तुलसी के जलम दिन
मठ पर जमात साधु के जमघट लाग गइल
‘भए प्रगट कृपाला‘ के अलाप सुनते सउॅंसे
भगतन के मंडल ताल लगावत जाग गइल।

करिआ कुच-कुच ऊ रात अन्हारी देश-धरम
हुलसी के रेती कोख दिहल कचनार धान
बदरी चीरत चहकल अजोर चानी-चानी
ऊ धप-धप भूइयॉं का अॅंचरा नया चान।

सब गावल गीत सुनत मन मठुआइल मुरकल
उखना भइलें तबसे सुन-सुन दरसन भईया
ई गीत पुतुरिया नाच चली कबले आखिर
असली तुलसी के तोहनी का पइब कहिया।

(20)
रमबोला, राम-भगत, कवि तुलसी, तापस रहले
ठीक बात!
धरती के धरम बॅंचावेला अइलें धरती पर
ठीक बात!
हुनका अइले से भगति के गंगा गर्हुअइली
ठीक बात!
काम रहलें, ठोकर खइलें, साधु भइलें
ठीक बात!
रामायण राम-रसायन दिहले हमनी खतिरा
ठीक बात!
हमनी रामायण पढ़त मरब तर जाएब सभनी
ठीक बात!

बाकि एगो बात बुझाइल ना केहू के
तनिका धीरज धरी सुनी सभनी ऐहू के

ऊ रामचन्द्र क राज भुलाइल बा कहवाँ
का अबही ले ना भइल इहाँ के धरम हान
कब होई ऊ अवतार भठाइ ऊॅंच-खाल
कब होई सबका घर से अगहनुआ विहान?

कब दूध मतारी के पी के लइका ढेकरी
कब कवनो तुलसी का घर होई काशी
कब कवनो तुलसी टेटनस भइले ना मरिहें,
कहिआ ले ई सतमी होई पुरनवाँसी?

कब शेर-सियारी एक घाट पानी पीहें
कबले बेयार पानी मिलिहें सब का सुगमे
कबले मधुआ लंका धहकी माटी होई
माटी उगली सोना कहिआ, कवना जुगमें?

कबले ठिकदारी चली धरम के धरती के
कबले किसान के घर से सीता हरन चली
कबले सीता का कंचन-मिरगा मोर रही
कबले रावन घर रास, राम घर मरन चली।

(21)
तबले उजाड़ होते जाई हमनी के घर
तबले उचाट होके तुलसी घर से भगीहें
तबले कविता ऊसर के भाषा ना बूझी
जबले कवि तुलसी जात के पेट टेम्हुआई।

कतना तुलसी के जलम भइल तबसे अबले
कतना तुलसी के चाट गइल माघी पाला
कतना रतना रोटी से आगा ना सोचल
कतना हुलसी के गरभ भूख के भीख भइल।

एही माटी-पानी के तुलसी रमबोला
एही बेयार में हीरदा उनकर भइल साफ
हमनी के राम-रसायन देके चलि दिहलें
हमनी के ई रामायण लेके का कइनी?

ऊ राम रमल बाड़ें हमनी का रग-रग में
ऊ रमबोला रोआँ-रोआँ से चिचिआता
हे जनक जाल छोड़ऽ धरती के दरद हरऽ
हे महावीर अब त लंका लचिकाइल बा।

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2 Comments on "भोजपुरी साहित्य के धरोहर हऽ – रमबोला"

  1. Abhishek Yadav | August 9, 2016 at 12:42 am | Reply

    कुछु नइखे बाँचल कहे लायेक ।
    सुघर रचना के बड़ाई कइल जा सकत बा बाकि अतना हरियान रचना खाती हमरा लंगे एकहि शब्द बा “बेजोड़”
    जब परे जवानी से पाला
    ना लउकेला ऊॅंचा खाला
    आगा- पीछा कुछ ना सूझे
    नीमन बाउर कुछ ना बूझे।

    ई उमीर ठनाठन लोहा ह
    गहुअन के गरभल पोआ ह
    गॉंठल गुमान छाती उतान
    ना सही आन ना सही बान।

    जब लगी ठेस ठकुआ जाई
    जरनइली कहीं भूला जाई
    जब लउकी जीनगी के पहाड़
    तब जोड़ लागी ताड़-ताड़।

    लहरी घरनी, घहरी ताषा
    गुमसुम में बिती बसमासा
    मोरी-भाथी तब अपना के
    दे दी मलेछ सब सपना के।

    @@@@@@@

  2. BAHUT BADHIYA

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