भोजपुरी लस्टम पस्टम
हँसत काहे नईखी सभे
- जयन्ती पाण्डेय
अर्थशास्त्री लोगन से लदाइल सरकार के अचके में पता लागल कि अरे अरबपतियन के ई देश में तऽ गरीबी के रेखा से नीचे रहे वाला ज्यादा बाड़े सन आ ऊ महंगाई के लेके हाला मचवले बाड़े सन, आ ऊ हाला से विरोधी पटियन के नेता घूर फिर सरकार के मीन मेख निकालत बाड़े सन.
बड़ा आश्चर्य भइल कि उदारीकरण के जमाना में ई कइसे हो गइल. सरकार तुरते एगो एनजीओ के कहलसि कि तनी पता लगावऽ कि का सांच बा. एनजीओ के बैंक एकाउण्ट में जब ई खोज खातिर लाखन रुपिया जमा हो गइल त अपना स्वयंसेवकन के पठवलसि पता लगावे खातिर. ओह में से जे सबसे हुंसियार रहे ऊ चल गइल लस्टमानंद के गांवे. गांव में ढुकते रामचेला भेंटा गइले. अबहीं उनका से बात होते रहुवे कि ओने से गुरु लस्टमानंद चलि अइलें.
का हो, ई के हऽ?
रामचेला बोलहीं के रहले कि ऊ बोल परलस. जी हम एगो एनजीओ के कार्यकर्ता हईं आ ई पता लगावे आये हैं कि आप सब काहे एतना उदास हैं? आप सभे हंसत काहे नइखीं?
गुरु कहलें, बचवा बात त ई बा कि ए घनघोर महंगाई के जमाना आ ओह पर से मौसम के मार. एहमें हंसे लायक का बा जे हंसल जाऊ?
ऊ बोललसि, ना जाने का कहऽतानी आप सभे. कवना मौसम के बात कहऽत बानी लोग. ई देस में त दुइये गो मौसम होला, एगो किरकेट के आ दोसरका चुनाव के. अबहीं त किरकेट के मौसम चल रहल बा. मजे से टीवी पर आईपीएल के मैच देखीं आ चीयर गर्ल्स के नाच के माजा लीहीं सभे. दुख आ चिन्ता लगे ना सटी.
लस्टमानंद के जान झोंकर गईल ओकरा बात से. कहले काहे ना सटी हो. देखऽ धान पानी बिना सूख गइल. रबी बोए खातिर करजा ले ले रहनी. रबियो मरा गईल आ करजा मूड़ी पर लदा गइल. अब बताव कि एह में केहू कइसे हंसी?
काहे ना हंस सकेला? बस सोचे के तरीका बदल लऽ. आपन दुख पर देश के व्यापक हित पर सोचा लोगिन. आजकल त देश के व्यापक हित एही में बा कि महंगाई के ले के बोलल बन्न क द आ वोट द सरकार के पक्ष में. टाइम बांचे त किरकेट देखऽ.
लस्टमानंद बोललें, भाई ई सब बात हमनी के बुझाला ना. हम त एटने जानी ला कि खेती मरा गइल त जीवन तबाह. एह साल गायेब का आ अगिला बरिस लगायेब का?
एनजीओ कार्यकर्ता कहलस कि, ओ बूझा. आप सबके मूल समस्या रोटी के बा. आप सब रोटी खाईल बन्न काहे नईखी क देत?
लस्टमानंद कहले, भल कहलऽ. रोटी ना खायेब त जियब कईसे? आ जियब ना त हमरा परिवार के पाली पोसी के?
आप रोटी ना खा के इटालियन पिज्जा खायीं सभे, चाउमिन खाईं सभे. कमी रोटी के होला, पिज्जा के कबहूं ना.
लस्टमानंद घिघियइले, बाबू पिज्जा त बड़ा महंग होला. हम गरीब गुरबा लोग हई कहां से खायेब? पईसा कहां से आई आ सब हमहीं खा जायेब त बाल बच्चा के का खियायेब?
अरे बुझाता कि आप सभे में इच्छा शक्ति के भारी अभाव बा. बैंक त करजा देबे खअतिर छिछियात चलऽता. बैंक से करजा लीहीं आ पिज्जा खाईं. लोन ले के टीवी ले लीं, फ्रीज ले लीहीं आ हमेसा हंसत रहीं. एकदम अमीर अइसन. सरकार भी खुश आ जनता भी खुश. भूख लागे त विकास दर के आंकड़ा देख लीहीं, सेंसेक्स के उतार चढ़ाव देख लीहीं. देखीं तऽ. नेता हंसऽता, अभिनेता हंसऽता, क्रिकेटर हंसऽता. बस ई जे आम आदमी कहाला उजे देश के बेड़ा गर्क करे में लागल बा. देस के खयाल करीं सभे. देस बा त सब केहु बा. ना त, जय जय सिया राम!

