– आलोक पुराणिक

AlokPuranik

उ चमचागिरी कइलसि, ओकर प्रमोशन हो गइल – काम के मामिला अपना के बड़हन ज्ञानी समुझनेवाला एगो दोस्त हमेशा भुनभुनात रहेले.

देखीं, उ बास के बीबी केला हौज-खास से जलेबी ले आवेला, ओकरा चार बेर इंक्रीमेंट मिल गइल.
देखी, हउ बास के बीबी के बास का गर्लफ्रेंड का बारे में बतावत रहेला, ओकरा फारेन टूर भेंटा गइल.

हमरा अइसनका भुनभुनाए वाला बंदन पर कवनो मोह ना लागे. अइसनका लोग बुनियादी तौर पर या तो बेवकूफ होलें ना त बेईमान. अरे अगर बास के बीबी खातिर जलेबी उ ले आवेला त जलेबी ले अवला के पुन्न वाला इनक्रीमेंट तोहरा मिली का. चमचागिरी उ करेला त प्रमोशन तोहार होखी का.

मतलब शिकायती लोग चाहेला कि बास के बीबी के जलेबी केहू दोसर खिआवे आ प्रमोशन इनकर हो जाव, इनक्रीमेंट इनका भेंटा जाव.

बड़हन-बड़हन समझदार लोग आके शिकायत करेला – उ बास के मालिश करत रहे, गुरु उ दफ्तर में बड़का पद टाप लिहलसि. अजब बेवकूफी के बात, इनका हिसाब से होखल ई चाहत रहुवे कि बास के मालिश उ करीत आ मालिश का बाद ई एप्लीकेशन दीत कि सेवा में सविनय निवेदन बा कि एह मालिश के फायदा हमरा खाता में ना, बलुक गुप्ताजी के खाता में जाए के चाहीं. मालिश हम कइनी, आशीर्वाद गुप्ताजी के दे दीं.

अबहसमुझ में आवत बा कि तुलसीदास कवना हालात में लिखले होखीहें कि ‘कर्मप्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि, सो तस फल चाखा।’ तुलसीदास का लगहूँ लोग रोवत आवत होखी -ओह दुष्ट के प्रमोशन हो लिहल. जानत बानीं कइसे भइल, बास के बीबी ला लखनऊ से साड़ी चहुँपावत रहुवे.

तुलसीदास प्रवचन में समुझवले होखीहें – बेटा, केहू दोसरा के कर्म के क्रेडिट तहरा खाते में ना आई. जवना खाता से लखनऊ के साड़ी जात बा, प्रमोशनो ओही राहे सफर करी. कर्म-प्रधान विश्व में ई होइए ना सके कि केहु के साड़ीवाला कर्म के फल तहरा खाते में ट्रांसफर हो जाव. ओकरा साड़ी से तोहरा प्रमोशन ना मिली. तोहरा प्रमोशन चाहीं त आपन खाता खोले के पड़ी. जो जस करहि,सो तस फल चाखा. माने कि बास के बीबी पर जे हौज खास के जलेबी खरच करी, प्रमोशन के मीठ रस ओकरे भेंटाई. इहे एह कर्म-प्रधान विश्व के खेल ह. केहु दोसरा के जलेबी से अपना ला उमेद राखल बेमतलब होला.

तुलसीदास जइसन बड़-बुजुर्ग एतना साफ बात लिख गइल बाड़न बाकिर तबहियों लोग समुझे में चूक जा ता. जो भजे हरि को सदा, वही परम-पद पावैगा, जेही लिखले बा, इहे बात कहे के कोशिश कइले बा. एह कहना के मतलब ई ह कि जे हरि के भजी, परम-पद ओकरे मिली. ई लाइन जेही लिखले बा, ओकरा बास के नाम हरि रहुवे. ओकरा दफ्तर में परम-पद माने कि फारेन-पोस्टिंग के दू गो दावेदार रहले. एगो बस काम से जुड़ल अधिका से अधिका ज्ञान बटोरे में लागल रह के परम-पद के ज्ञान-मार्ग पर चले के कोशिश करत रहल, दोसरका भांति-भांति से हरि के भजत रहुवे. जलेबी का राहे, लखनऊ के साड़ियन का राहे. से एह नंबर टू वाला के परम-पद मिल गइल. माने कि परम-पद के भक्ति मार्ग चल निकलल, परम-पद के ज्ञान मार्ग एह घरी फ्लाप होखत लउकत बा.

अगर सिरिफ ज्ञाने से परम-पद मिले के रहीत, त सगरी ज्ञानी परम-पदन पर जमल रहतें. बाकिर मामिला उलट बा. ज्ञानी झुँझुआइल बाड़न, कहत बाड़े कि – उ त मालिश करेला, एही से प्रमोशन मिल गइल. ओने हरिभजन पथ के पथिक एह चिता फिकिर, अछरंगन से दूर, निस्पृह भाव से हरि के प्रसन्न करत परम-पद के आनंद लेत बाड़े. ज्ञान मार्ग भक्ति मार्ग का मुकाबले जतना बौना अबहीं लउकत बा, ओतना कबहू ना लउकल.

बड़-बड़ ज्ञानी टापत रह जाले, भजेवाला खेल कर जाले. भजन के काट नइखे. बड़-बड़ ज्ञानियन के जानीला, ज्ञान के शास्त्रार्थ में कहेू से ना हरलें, बाकिर भजन-मंडली का आगा बेबस हो जालें.

एहसे परम-पद खातिर भक्ति-मार्गे बढ़िया ह, ई साबित हो जाता.

सीख – एह कहानी से हमनी के नीचे बतावल सीख मिलत बा –

1 – विश्व कर्म-प्रधान ह, सबका अपना कर्मे के फल मिलेला, दोसरा के कर्म के ना. बास के बीबी ला जलेबी केहू अउर ले आवे आ प्रमोशन केहू दोसर के हो जाव, ई बात कर्म-सिद्धांत के खिलाफ हवे.

2 – हरि नाम के बास के जे भजल करी, परम-पद ओकरे मिली. ई बात केहू काट ना सके.

3 – ज्ञान मार्ग भक्ति मार्ग का मुकाबले जतना बौना अबही लउकत बा, ओतना कबहू ना लउकल.


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