– अशोक मिश्र

आजु पूरा देश में चारों तरफ बस अन्ने अन्ना छवले बाड़े. जेकरे देखऽ उहे अन्ना हजारे अउर उनुका जनसरोकारन के लेके कइल आंदोलन पर ना खाली चरचा करत बा, बलुक आपना समुझ का मुताबिक रायो जाहिर करत बा. एकर कारण बा. कारण ई बा कि करोड़ों लोग एह आंदोलन से कवनो ना कवनो रूप में जुड़ल रहले. केहू आपन काम-काज छोड़के दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचल रहे, त केहू अपना गलिए में सिरिफ कैंडल जलाके रह गइल. कुछ लोग फैशन में अन्ना से जुड़ले, त केहू साचहू चाहत रहे कि अन्ना हजारे सफल होखसु आ देश से भ्रष्टाचार के खात्मा होखे. एह जन जुड़ाव के चलते अन्ना हजारे पिछला दिने जनांदोलन के एगो प्रतीक बन के उभरले. ई जन जुड़ावे रहल कि सरकार के मजबूर होके छूट्टी का दिने संसद आहूत करके ध्वनिमत से तीनों प्रस्तावन के पारित करे पड़ल. लोकतंत्र में ‘लोक’ के शक्ति के एहसास पहिला बेर महसूस भइल. एकरा पहिले त पूरा ‘इंडिया’ अधनीना हालत में रहल. अन्ना हजारे के आंदोलन हमनी के ठीक ओही तरे झकझोर के आंख खोले पर मजबूर कर दिहलसि, जइसे कवनो शरारती बच्चा कवनो बाति पर नाराज होके शतरंज के बिछल बिसात झकझोर के राखि देव आ शतरंज खेले वाला लोग अकबका के रहि जाव. अन्ना के आंदोलन से पहिले हमनी के समाज के मानसिकता ‘मूंदहु आंख कतहु कुछ नाहीं’ वाली रहल. हमनी सभका आँतर में एगो बात घर कर गइल रहल कि हमनी का लाख कोशिश कर लीं, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई जइसन अउरी समस्यन के दूर कर पावल हमनी का वश में नइखे. एकरा खातिर हमनी का अपना के दोषी मनला का बजाय सगरी जिम्मेदारी केंद्र भा राज्य सरकारन, उनुकर प्रशासनिक अमलन पर थोपके अपना कर्तव्य के इतिश्री मान लेत रहीं. हमनी के ई मान बइउल रहीं जा कि समाज के स्वस्थ अउर सुरक्षित राखल सिरिफ सरकार अउर सरकारी नुमाइंदन के काम ह, लेकिन अन्ना हजारे के आंदोलन एह मिथक के तूड़ दिहलसि. कहे के मतलब ई बा कि एह आंदोलन से समाज की नींद जरूर टूटल बा, लेकिन अबहियो ठीक से जागल बाकी बा.

अन्ना जेपी के बादके सबले बड़ आंदोलन खड़ा करिके ई समुझवलन कि यदि साध्य अउर साधन जनसरोकारन से जुड़ल होखें, त सरकार के निहुरे खातिर मजबूर कइल जा सकेला. जरूरत त ओह जड़ता के तूड़े के बा, जे सांप बनके हमनी का मन अउर समाज में कुंडली मारके बइठल बा. आ अन्ना हजारे इहे कइलन. इहे उनुकर सबले बड़ हासिल बा.

संसद में उनुकर तीनों माँग, नागरिक संहिता, केंद्रीय अउर राज्य कर्मचारियन के लोकपाल का दायरे में लावे अउर सगरी राज्यन में लोकायुक्त के स्थापना पर प्रस्ताव पारित हो चुकल बा. अब ओह पर स्थायी समिति विचार करी. एकरा बादे ई कानून बनि के भ्रष्टाचार का खिलाफ एगो मजगर हथियार बन पाई. दरअसल, खास ई नइखे कि संसद में कवन बिल पेश कइल गइल, भ्रष्टाचार के खिलाफ संसद में कवन कानून पारित भइल. सबले खास ऊ व्यवस्था बिया, जे भ्रष्टाचार के जनम देले. भ्रष्टाचार के जने वाली व्यवस्था के विनाश आ हटाव के बाति होखे के चाहीं. जबले हमनी का अइसन सामाजिक व्यवस्था नइखीं गढ़ लेत, जे भ्रष्टाचार के प्रश्रय ना देव, तबले अन्ना हजारे जइसन लोग सिरिफ आंदोलन करत रही, गरीबी, बेकारी, महंगाई अउर भ्रष्टाचार रोके का कवायद का नाम पर कुछ तमाशा होत रही आ देश के मुट्ठी भर लोग करोड़ों जनता के मेहनत से उपजावल अतिरिक्त पूंजी (मुनाफा) के उपभोग करत रहीहें, शोषण अउर दोहन का साथे-साथ भ्रष्टाचारो के तांडव चलत रही. लेकिन एकर मतलब ई कतई नइखे कि अन्ना के लड़ाई बेकार गइल. अन्ना के माध्यम से छेड़ल एह जनांदोलन के सबले सार्थक पहलू ई बा कि अब हमनी का लड़ल सीखे लगनी. बस जरूरत एह बाति के बा कि लड़े के एह कला के उपयोग ओह व्यवस्था का खिलाफ करे के बा, जे भ्रष्टाचार के गंगोत्री हियऽ. भ्रष्टाचार के गंगोत्री के उद्गम कहवाँ बा, एकर तलाश अबही बाकी बावे. वइसहू अन्ना हजारे के अनशन तूड़ला आ संसद में तीनों प्रस्ताव पारित होखला का बादो कुछ सवाल बाड़ी सँ जवना के जबाब मिलल अबही बाकी बा. सबले पहिले त ई तय होखल बाकी बा कि जब लोकपाल विधेयक कानून बन जाई, त ओकर स्वरूप का होई ? लोकपाल नामक संस्था ककरा प्रति जवाबदेह होई ? ओकरा के चलावे खातिर धन कहवाँ से आई ? लोकपाल, संसद अउर न्यायपालिका का बीच तालमेल कइसे बइठावल जाई ? थोड़ देर ला यदि मान लिहल जाव कि लोकपाल संस्थे के कवनो अधिकारी भ्रष्टाचार में लपटाइल मिले त ओकरा खिलाफ कइसन आ कवना हद ले कार्रवाई होखी ? एह जइसन कुछ अउरियो सवाल बाड़ी सँ जवना के जबाब मिले में समय लागी.


लेखक अपना बारे में जवन बतावत बाड़े :

जब साहित्य समुझे लायक भइनी त व्यंग्य पढल नीमन लागे लागल. व्यंग्य पढ़त-पढ़त कब हमहू लिखे लगनी पते ना चलल. पिछला 21-22 बरीस से व्यंग्य लिख रहल बानी. कई गो छोट-बड़ पत्र-पत्रिकन में खूबे लिखनी. दैनिक स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आ अमर उजाला जइसन प्रतिष्ठित अखबारनो में खूब लिखनी. कई गो पत्र-पत्रिकन में नौकरी कइला का बाद आठ साल दैनिक अमर उजाला के जालंधर संस्करण में काम कइनी आ लगभग चार महीना रांची में रहनी. लगभग एक साल दैनिक जागरण में काम कइला का बाद अब दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस (आगरा) में बानी. हमार एगो व्यंग्य संग्रह ‘हाय राम!…लोकतंत्र मर गया’ दिल्ली के भावना प्रकाशन से फरवरी 2009 में प्रकाशित भइल बा. आगरा में उम्मीदन के नया सूरज उगी एही उमेद का साथे संघर्ष में लागल बानी.

संपर्क सूत्र –
अशोक मिश्र,
द्वारा, श्रीमती शशि श्रीवास्तव,
५०७, ब्लक सी, सेक्टर ६
आगरा विकास प्राधिकरण कालोनी,
सिकन्दरा, आगरा

Ph. 09235612878

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