– अशोक मिश्र

सबेरे मार्निंग वॉक करे निकलनी त सोचली कि उस्ताद मुजरिम से मिल लिहल जाव. से वॉक से लवटति घरी उनुका ‘गरीबखाना’ पर पहुंच गइनी. हमरा के देखते मुजरिम खुश हो गइलन आ कहले, ‘आवऽ..आवऽ..बड़ा मौका पर आइल बाड़ऽ. तोहरा के अबही थोड़ देर पहिले यादे करत रहीं. बात दरअसल ई बा कि एगो कविता के कुछ लाइन के मतलब हमरा समुझ में नइखे ऽत. तू काव्यप्रेमी हउवऽ एहसे हो सकेला कि तू ओकर अर्थ बता सकऽ. कविता के लाइन हईं सँ ‘कहो फलाने अब का होई…। अब तौ छूटल घाट, धोबिनिया पटक-पटक कै धोई। कहो फलाने अब का होई…।’
उस्ताद मुजरिम के बाति सुनिके पलभर ला त हमार दिमाग भक्क से उड़ गइल. कुछ देर ले सोचनी-विचारनी. फेर कहनी, ‘उस्ताद! ई लाइन कवना कवि के हऽ, से त हम ना बता सकीं. हमार अंदाज बा कि ई उत्तर प्रदेश के कवनो पुरान लिखाड़ कवि के ह. हँ एह लाइनन के अर्थ संदर्भ बदलला पर बदल जाई. अगर हम एकरा के कबीर के रहस्यवादी दर्शन से जोड़ीं, त एकर मतलब ई होई कि एह धरती पर पापाचार अउर अनैतिक कृत्य देख-सुनि के एगो आत्मा बिलबिला उठत बिया आ दोसर आत्मा से कहत बिया कि हे भाई! भगवान हमनी के एह धरती पर लोग के भला करे भेजले रहले, एह बाति के हमनी का माया, मोह, भाई-भतीजावाद में पड़ि के भुला गइनी. अब आखिरी समय आ पहुंचल बा, अब त धोबिन रूपी परमात्मा पाप-पुण्य रूपी घाट पर हमनी के पटक-पटक के धोइहें आ हमनियो कि चौसठ करोड़ योनियन में भटके खातिर भेज दीहें. ऊ आत्मा तब डेरा के पूछत बिया कि, “हे भाई! अब हमनी के का होखी ?”
एतना कहि के हम सांस लेबे रुकनी आ कहल शुरू कइनी, ‘एकर दोसरका अर्थ में पूरा लोकतांत्रिक व्यवस्था के रहस्य लुकाइल बा. एह लाइनन के गहन मीमांसा कइला पर ई अर्थ निकलत बा कि एगो सांसद भा मंत्री दोसरा सांसद भा मंत्री से कहत बा कि हे भाई! हमनी के का होई ? अबकी चुनाव अइला पर जनता रूपी धोबिन पोलिंग बूथ रूपी घाट पर हमनी के वोट ना दे के हमनी के पटक दी आ आजु जवन नेता विपक्ष में बइठल बाड़न, ऊ हमनी के कइल भठियरपन का खिलाफ जांच आयोग बइठा के हमनी के सगरी कृत्य धो दी.’ एतना कहके हम सांस लेबे खातिर रुकनी.
हमार बाति सुनि के मुजरिम मंद-मंद मुसुकात रहलन आ फेर कहले, ‘तोहरा लेखा योग्य शिष्य पा के हम धन्य हो गइनी. एह लाइनन के तू जवन सुंदर व्याख्या कइलऽ, ऊ काव्य के बड़का-बड़का महारथियनो खातिर दुरूह हो सकत रहे. हम तोहरा व्याख्या से संतुष्ट बानी.’ एतना कहि के उस्ताद मुजरिम हमरा के चाय बनावे के हुकुम सुनवले आ अपने सोफा पर पसरत खर्राटा लेबे लगलन. आ हम चाय बनावे के हुकुम पर बिनबिनात रसोई में घुस गइनी.


लेखक अपना बारे में जवन बतावत बाड़े :

जब साहित्य समुझे लायक भइनी त व्यंग्य पढल नीमन लागे लागल. व्यंग्य पढ़त-पढ़त कब हमहू लिखे लगनी पते ना चलल. पिछला 21-22 बरीस से व्यंग्य लिख रहल बानी. कई गो छोट-बड़ पत्र-पत्रिकन में खूबे लिखनी. दैनिक स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आ अमर उजाला जइसन प्रतिष्ठित अखबारनो में खूब लिखनी. कई गो पत्र-पत्रिकन में नौकरी कइला का बाद आठ साल दैनिक अमर उजाला के जालंधर संस्करण में काम कइनी आ लगभग चार महीना रांची में रहनी. लगभग एक साल दैनिक जागरण में काम कइला का बाद अब दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस (आगरा) में बानी. हमार एगो व्यंग्य संग्रह ‘हाय राम!…लोकतंत्र मर गया’ दिल्ली के भावना प्रकाशन से फरवरी 2009 में प्रकाशित भइल बा. आगरा में उम्मीदन के नया सूरज उगी एही उमेद का साथे संघर्ष में लागल बानी.

संपर्क सूत्र –
अशोक मिश्र,
द्वारा, श्रीमती शशि श्रीवास्तव,

५०७, ब्लक सी, सेक्टर ६
आगरा विकास प्राधिकरण कालोनी,
सिकन्दरा, आगरा

Ph. 09235612878

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