– डाॅ. अशोक द्विवेदी

AKDwivedi-Paati

बहुत पहिले एक बेर क्रिकेट देखत खा, भारत के ‘माही’ मिस्टर धोनी का उड़त छक्का के कमेन्टरी वाला ‘हेलीकाप्टर शाट ‘ का कहलस, ओके नकलियावे क फैशन चल निकलल. नीचे से झटके मे़ ऊपर उठावे वाला ई हेलिकाप्टर स्टाइल विज्ञापन वाला ले जाके लेहना काटे वाला मशीन से जोड़ दिहले सऽ. एही तरे राजनीति का नूराकुश्ती में आपुसी घात-प्रतिघात क स्टाइल बदल गइल बा. एहू में नया नया प्रयोग, आ नया रिसर्च हो रहल बा. दक्षिणपंथी, वामपथी, नरमपंथी, चरमपंथी, मध्यममार्गी दल नया नया स्टाइल अपना रहल बाड़े सऽ. अखाड़ा मे़ं उतरला का पहिलहीं पैंतरा चालू आ टेम्पो हाई करे खातिर बोलबाजी हावी हो जाता.

“धुरिये मे़ं जेंवर बरल (रसरी बरल)” गाँव क गपोड़ियन के मनोविनोद अकल्पनिय आनंद के विषय होला. राजनीतियो एकरा के अपनाइ के “बेबात बवंडर”से काम रोकले में आपन हित देखsतिया. पछिला साल दिल्ली का चुनाव में “बाल के खाल निकाले” वाला ‘केजरीवार’ स्टाइल अस चमकल कि ओकर विरोधो करे वाला बड़ बड़ स्टाइलिस राजनीतिक ओही स्टाइल के अपनाइ के बाल के खाल निकाले आ लीपे पोते शुरू दिहले स. काम न धाम सबकर नीद हराम.

पहिले एगो अलीबाबा का पाछा चालीस गो चोर रहले सऽ. अब त चालीस का सँगे चउदह गो अउर जुटि गइल बाड़े स. सहयोगी भा पछलगुवन के आपन आपन दाल गलावे खातिर सझिया क हाँड़ी चाही. चालीस चोरन का गोदाम में हँड़िया क कवन कमी ? उहवाँ त सोना चानी क केतने हँड़िया बटलोही गाँजल रहे. सहजोगिया सोचले स कि दाल त दाल रिन्हाई; हँड़िया फिरी भे़ंटाई ! चोरन क सरदार चिचियाव, एकरा पहिलही मय पछलगुवा एक-ए-गो हँडिया लेके जोर जोर से चोकरे चिचियाये शुरू क दिहले सऽ. बूझि ली़ं कि केजरीवार स्टाइल फेर हिट हो गइल. बलुक एबेर त अतना हिट भइल, अतना हिट कि संसदे ठप्प हो गइल.

चुनाव-चरचा में गुणा-गणित के हिसाब किताब मीडिया चैनल ढेर करेले सन. जइसे मान लीं कि लगले एगो प्रदेश मे़ चुनाव होखे वाला बा; त मये खुर्राट गणितज्ञ जात-पात आ धरम-करम से थाकि के दिल्लिये वाला बालू पर आपन भीति उठावे शुरू क दिहले स आ ओने जनता ए लोगन के “घुघुवा मन्ना “खेलावे लागल. घुघुवा मन्ना खेलावत खा एगो गीत गवाला .. ‘घुघुवा मन्ना, उपजे धन्ना. नई भीत उठेले, पुरानी भीत गिरेले ..” त पुरनकी भीत बचावे का चक्कर मे़ं गठबन्धन क टोटरम होखे लागल. एह टोटरम में सइ गो टोटका ! त कबो लउवा लाठी चन्नन आवsता त कबो ‘ओका-बोका तीन तड़ोका’. इजइल,बिजइल का करिहे़ं; ढोंढ़िया पचकबे करी.

ई बालो ससुर ना सोचले होंइहें कि अइसन अफदरा परी; कि उनकर अइसे आ एतना खाल निकालल जाई ? हमरा सोझिया मति से त ईहे बुझाता कि अब सुधार आ बिकास के डहर बहुते कठिन बा, काहे़ कि बाल के खाल निकाले वाला खेल में जनतो के मजा आवे लागल बा. मजा लेबे का चक्कर में, कहीं ऊ गफलत में मत परि जाव ? गुलामी, गरीबी, बदहाली, असमानता आ नियति के थपेड़ा खात-खात पीढ़ी गुजरि गइल. कतने ‘तंत्र’ का बाद “लोकतंत्र” आइल आ अइबो कइल त ‘बानर का हाथ क खेलवना ‘ हो गइल. हाय रे करम ! एके बनरा कब ले छोड़िहें सs?


डाॅ. अशोक द्विवेदी भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका पाती के संपादक हईं आ बहुत रिगिर कइला पर भोजपुरिका खाति नियमित ब्लांग लिखे ला तइयार भइल बानी.

अशोक द्विवेदी, निरउठ, बानर के हाथ के खेलवना, लोकतंत्र

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