– डाॅ. अशोक द्विवेदी

AKDwivedi-Paati

चउधुरी साहेब के पम्पिंग सेट जब मर्जी होला तबे चलेला. दस लीटर डीजल दिहला पर, तीन चार दिन दउरवला का बाद एक दिन चलल त रामरतन के बेहन परि गइल आ जब रोपे क बेरा आइल त कीच-कानो भर क बरखा भइल. दू दिन का छिलबिल से अगराइल रामरतन मेहरारू आ बेटी का बले रोपनी त क लिहले बाकि बदरी अस नाच नचवलस कि सगरी असरा उमेद मुरझाए लागल. रामरतन के बेटा मेहरि लेके शहर चल गइल. पहिले ऊ टेक्टर टेम्पू चलावत रहे त बेर बागर खाद बीया आ दर-दवाई में मदद क देत रहे. अब छव महीना से ओकर पतो ठेकान नइखे. रामरतन बतवलन कि ऊ कवनो हैन्डलूम वाला के मिनी ट्रक से माल ढोवाई क काम करत रहे बाकि मन्दी का वजह से उहां नोकरियो छूट गइल पता ना कहाँ बा ? कवनो जोहो समाचार ना देलस.

हमहूँ एगो सनकी बानी, गाँव क रोपनी छोड़ शहर में पहुँच गइली़. आज प्रधानमंत्रीजी चेन्नई गइलीं त हैन्डलूम आ खादी के प्रदर्शनी देखलीं; ओके बचावे-सँवारे क बात कइलीं. हाथ के बीनल कपड़ा कीने क अपीलो कइलीं. हमरा का जाने काहे उनकर ई परेम औपचारिके लागल. परंपरागत कामन प संकटे संकट बा. किसान सगरो उल्टा परिस्थिति का बादो अपना टुकड़ा भर खेती क मोह नइखे छोडत आ बुनकर लाख दुरदसा का बादो आपन काम नइखे छोडत. बाकि दूनों धन्धा से पलायन जारी बा. शहर में कमाए क कतने जरिया बा. रेकसा-ठेला, मजदूरी, कारीगरी भा छोट मोट रोजी रोजगार क उपाय बा.

रामरतन क लड़िका जोलहा बुनकर त रहे ना; बाकि उनहन का बीच मे जियका क जोगाड़ क लेले रहे. ऊहो छूट गइल. काहें ? काहें कि खेती का परंपरागत काम का सँगग सँग दुसरको पुश्तैनी रोजिगार प गरहन लाग गइल. ईहो एगो संजोगे कहाई कि पछिला चुनाव मे़ एही बनारस से सांसद चुनाइल आज देश क प्रधानमंत्री बा. ऊ अपना चुनाव अभियान का बाद अइलन त किसान, गाँव, आ बुनकरन से सहानुभूतियो देखवलन, कुछ सपनो देखवलन. अंगरेजन का समय से दिनों दिन खराब आ खस्ताहाल होत गइल खेती आ परपरागत रोजगारन से जोराइल लोगन का भितरी उमेद क किरिन फूटल; बाकि का सचहूँ एह घुनल, नोनियाइल व्यवस्था मे कवनो खास बदलाव आइल ? खेतिहर आ बुनकरन के बदहाली खतम होत लउकत बा ? लाखन का कपार प ना त ढंग क छत बा ना सुविधान भोजन बस्त्र. दुनिया खातिर कपड़ा बुने वाला बस्त्र से वंचित बा त अनाज फल उपराजे वाला भरपेट भोजन से. सरकार चाहे केन्द्र क होखे चाहे प्रदेश के, गंभीरता से मिल के बहुत कुछ कर सकेले; बाकि राजनीति ?

सपना देखल आ देखावल खराब ना होला सपना के मुवल आ मुवावल खराब होला. कर्ज, पुनर्वित्त, संसाधन आ राहत के घोषणा का बादो काहें एह बेचारा बुनकरन खेतिहरन के बदहाली दूर होखे क नाँव नइखे लेत ? जबाब साफ बा – एगो त ईमानदार कोसिस क अभाव बा दुसरे बिचवलियन आ दलालन के माया मकड़जाल. एहसे छुटकारा मिलित त साइत बहुत कुछ होइत. ओइसे ई एघरी आम जीवन में समा गइल बा. उँघइले-महटियइले नइखे दूर होखे वाला. कुछ हमनी का जागी जा; कुछ सरकारो चेतो !


डाॅ. अशोक द्विवेदी भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका पाती के संपादक हईं आ बहुत रिगिर कइला पर भोजपुरिका खाति नियमित ब्लाग लिखे ला तइयार भइल बानी.

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