– जयंती पांडेय

बाबा लस्टमानंद सुर्ती फाँक के रामचेला के कहले, जान जा ए बबुआ, आजकाल्हु अपना देस के राजनीति में कई गो नया तरह के वाद चल गइल बा. जइसे आजादी के जमाना में गाँधीवाद चलल रहे आ नेहरू-शास्त्री के जमाना में लोहियावाद आ ओकरा बाद चलल चमचावाद आ अब शुरू भइल बा निंदावाद, हाँ-हाँ वाद, नकटावाद, माफीवाद, आ थूकवाद. राजनीति ई वाद सबके डगर पर डगमग करत बुढ़ा रहल बा कि बचकानी हो रहल बा, ई कहल मुश्किल बा.

पहिले त राजनीति में विरोधी के निंदा प्रधान रस होला. इहे ऊ मजबूत नींव ह जे पर ऊ अपना सपना के महल खड़ा कर सकेला. विरोधी कवनो काम करे रउवा ओहमें दोष निकाले खातिर पहिले से तइयार रहीं. धेयान रहे, निंदा एतना घनघोर आ चऔतरफा करीं कि जनता के ऊ नेता में सांचो खोट लउके लागे. अबन निंदा करे के तरीका कई गो होला. तहरा त रामचेला निंदा करे के बा कवनो मोकदिमा त करे के नइखे कि मार सबूत जुटावऽ आ गवाह खड़ा करऽ. खाली धूरा त झोंके के बा. चिला चिला के कहऽ कि एहमें कमीशन महकऽता, जनता के हित के खयाल नइखे राखल गइ॥.

अब जनता के का मालूम कि ओकर हित का होला. एकर फायदा ई होला कि ना हर्रे लागे ना फिटकीरी आ रंग खूब चकाचक हो जाला जे महीनन चलेला. अब एगो नया वाद हऽ हाँ-हाँ वाद. ई असल में चमचावाद के सुधरल रूप ह. एहमें आदमी चमचा अइसन बेचारा आ गरीब ना लागेला, बलुक एकदम बुद्धिजीवी अइसन लागेला आ हाईकमान के हर बात पर अइसन एक्टिंग करे के बा कि बस बात बूझऽतारऽ आ ओकरा बाद से हीं-हीं क के हाँ-हाँ क देबे के बा आ हाईकमान के बात प ठेपा लगा देबे के बा. एकरा से भविष्य सुरक्षित रहेला आ पार्टी में भाव बढ़ेला.

आगे चल के इहे हीं-हीं आ हें-हें के मोकम्मल रस में बदल के जिनिगी रसदार क देला. कम्युनिस्ट भाई लोग अइसन ना-ना वाद में का धइल बा? एकरा बाद बा नकटावाद के. पहिले नेता पर आरोप लागो त ऊ पद से इस्तिफा दे देउ लेकिन अब त कहल जा ता कि एकरा खातिर कुर्सी काहे छोड़ल जाउ? बेशरम खानि कहल जाला कि का भइल जे एक करोड़ घूस में लिहले, फलनवां पार्टी के लूटचंद त तीस करोड़ पचा गइले आ कहेवाला केहु नइखे. एकरा बाद बा सबेरे से साँझ ले गरियावत रहऽ आ राति बेरा माफीं माँग लऽ.

एकरा बाद होला छूकवाद. एकदम आक्थू कार्यक्रम. एहमें ई देकल जाला कि केकर थूक सबले गाढ़ होला आ सबसे दूर ले जाला. के कतना हाली हाली-हाली थूकेला आ केतना गिर के थूक सकेला. एहमें सबसे बड़हन फायदा ई होला कि विरोधी दल से नेवता आवेला कि फलनवा पर थूकऽ. आ घर भर जाला.

रामचेला, राजनीति के ई नया डगर पर चलबऽ त तोहार तरक्की तय बा ना त जिनिगी भर झंडे ढोवत रहि जइबऽ.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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