गदहन के प्रोमोशन

jayanti-pandey

– जयंती पांडेय

रामचेला बड़ी परेशान रहलन. काहे कि उनकरा आफिस में ढेर लोग के परमोशन भइल बाकिर उनकर ना भइल रहे. अब इ बात के दुखड़ा उ केकरा से रोवस. बस मुंह लटकवले रहस. अब लस्टमानंद त घाघ. उ आपन चेला के दरद बुझ गइलन. एक दिन एकांता देख के पूछिए लेहलन, ‘काहे बाबू, कउना बात से परशान बाड़? बतइब त मन के दुख कुछ हलुके होई अउर हो सकता कि कउनो रस्तो निकल आए.’

रामचेला सकुचात-सकुचात बतवलन कि उनकरा डिपारटमेंट में कई लोग के परमोशन भइल बाकिर उनकरा के छोड़ दिहल गइल. एहिसे काम में मन नइखे लागत.

लस्टमानंद ठठाइके हंसलन अउर एगो कहानी सुनाये लगलन. रउओ सबे सुनीं –

एगो सरकारी आफिस ढेर ऊंच जगह पर बनल रहे. ढेर दिन से गदहा के पीठी पर पानी लाद के ओहिजा पहुंचावल जाये. जउन गदहा के एही काम में लगावल गइल रहे ओकरा के घास खातिर रोज-रोज मजूरी दिहल जात रहे. एगो मरमाह चपरासी ओही पइसा से घास खरीद के ओही गदहा के आगे डाल देत रहे. एक बेर नोटिस आइल कि ओहिजा जेतना लोग काम करेला ओकर नाम भेजल जाए अउर ओकरा के परमानेंट करमचारी मानल जाव. एगो मरमाह बड़का बाबू ओहिजा काम करस. उ गदहवा के नाम ‘गदर्भ दास’ लिखी के ओकरा आगे ‘सेवक’ लिख के भेज देहलन. एकरा बाद सरकारी कायदा- कानूने के मोताबिक अब आफिस से ओकरा कामो के रिपोर्टो भेजाए लागल, जेमे बतावल गइल कि ओकर काम बहुते बढ़िया बा. काम के मोताबिक बाद में सीनियरन के लिस्ट में ओकर नाम ढेर मजदूरी के साथ चढ़ावे के फरमान जारी भइल. इ हुकुम के पालनो होखे लागल. एही बीचे कउनो अधिकारी एह बात पर आपत्ति जतवलन कि गदहन के परमोशन नाहीं हो सकेला, अउर इ फाइल अपना बड़का अफसर का लगे पठा दिहलन. बड़का अफसर एकदमे सरकारी नियम कायदा में चले वाला रहलन. त उ आपन टिप्पणी दिहलन कि ‘नियम अउर पहिले के सिफारिश के मोताबिक बढ़ावल तनख्वाह दिहल जाए, काहे कि गदहा के परमोशन ऊपर से भइल बा, एही से अधिकारी लोग के आदेश के मानल जरूरी बा. हमनी के काहे रिस्क ली जा. जब ओकर काम बढ़िया बा त ओकरा के सीनियर भइला के लाभ मिलहीं के चाहीं. ओकर लाभ घटवला के रिस्क काहें लिहल जाए. एह बात पर कउनो पशु प्रेमी बवाल कर दी त ओकर जिमदार के होई. काल उ गदहा कोर्ट में खड़ा हो जाई त के जवाब दिही. ‘मानव अधिकार आयोग’ भा ‘पशु अधिकार आयोग’ के के जवाब दिही. छोटका अफसर चुपा गइलन. अब उ गहदा परमोशन पा के ए घरी मस्त बा.

आपन गुरु लस्टमानंद के सुनावल इ कहानी पर रामचेला के दुख हलुक भइल कि नाहीं, बाकी उ इ बात बूझ गइलन कि गदहों के परमोशन रिपोर्ट कार्ड के आधार पर हो जाला, अइसना में उनकरा आपन रिपोर्ट कार्ड हमेशा दुरुस्त रखवाये के पड़ी. उन कर आंख अब खुल गइल.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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1 Comment

  1. हा …हा …हा …हा …हा … बहुत नीमन, मजा आ गइल।

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