दोसरा के सतावल भक्ति ना हऽ

– जयंती पांडेय

ओह दिन जब भगतजी मुअले, तऽ सबलोग कहऽल – भगतजी स्वर्गवासी हो गइले. पर अब मालूम भइल कि भगतजी, स्वर्गवासी ना, नरकवासी भइले हंऽ. हम कहब तऽ केहू मानी ना, पर इहे सही हऽ कि उनका नरक में डाल दिहल गइल बा आ उन पर अइसन जघन्य पाप के आरोप लगावल गइल बा कि जल्दी नरक से छूटला के उमेद नइखे. अब हम उनकरा आत्मा के शान्ति के प्रार्थना करीं तबहुं कुछ ना होई. बडहन से बड़हन शोक-सभो उनका के नरक से ना निकाल सकेले.

पूरा गांव अबहियो कहेला कि भगतजी मंदिर में आधा रात ले भजन करत रहले. हर दू-तीन दिन में ऊ कवनो मालदार श्रद्धालु से मंदिर में लाउड-स्पीकर लगवा लेत रहले आ ओह पर अपना मंडली समेत भजन करत रहले. पर्व- त्योहार पर त चौबीसों घंटा लाउड-स्पीकर पर अष्टयाम होत रहे. एक-दू बार गांववाला लोग ई अखण्ड अष्टयाम के विरोध कइल लोग तऽ भगतजी भक्तन के भीड़ जमा कऽ के दंगा करावे पर उतारू हो गइले. ऊ भगवान के लाउड-स्पीकर पर प्राण देवे और प्राण लेवे पर तुल गइले.
अइसन ईश्वर-भक्त, जे अरबों बार भगवान के नांव लिहले, नरक में भेज गइले आ अजामिल, जे एक बेर भूल से भगवान के नांव ले लिहले रहले, अबहियो स्वर्ग में मजा लूटऽतारे. ई अंधेर ना तऽ का हऽ ? अंधेर कहां नइखे !

भगतजी बड़ा विश्वास से ऊ लोक में पहुंचले. बडा देर ले इहां-उहां घूमके
देखत रहले फेरु एगो फाटक पर पहुंच के चौकीदार से पूछले – स्वर्ग के दुआर इहे हऽ न ?

चौकीदार कहलस – हँ, इहे हऽ.

भगत जी आगे बढ़े लगले, तऽ चौकीदार रोकलस – प्रवेश-पत्र यानी टिकिट देखाईं.

भगतजी खिसिया गइले. बोलले हमरो टिकिट लागी इहां ? हम तऽ कबहियो टिकिट ना लिहनी. सिनेमा बिना टिकिट देखतऽ रहनी आ रेलो में बिना टिकिटे बइठत रहीं. केहू हमरा से टिकिट ना मांगल. अब इहां स्वर्ग में टिकिट मांगऽतारऽ ? हमरा के जाने लऽ ? हम भगतजी हईं.

चौकीदार कहलस – होखबऽ. पर हम बिना टिकिट ना जाये देब. आप पहले ऊ आफिस में जाईं. ऊहां आपके पाप-पुण्य के हिसाब होई अउर तब आपके टिकिट मिली.

उहां पहुंचला पर एगो दूत भगत जी के लेके भगवान के पास गइल. भगवान पूछले – तूं का कइले बाड़ऽ, जे तोहरा स्वर्ग मिले ?

भगतजी दीन भाव से बोलले – रोज आपके भजन करऽत रहनीं.

भगवान पूछले – लेकिन लाउड-स्पीकर काहे लगावत रहलऽ? एकरा से लइकन के पढ़ाई आ बच्चा-बूढ़ा की नींद हराम हो गइल.

भगत साहस बटोर के कहले – भगवान आपके नांव लोग के कान में जात रहे, ई तऽ उनका खातिर अच्छे रहे. ऊ लोग के अनासो पुण्य मिल जात रहे.

भगवान के भगत के मूर्खता पर तरस आ गइल. बोललें – पता ना ई परंपरा कइसे चलल कि भगत के मूर्ख होखल जरूरी हऽ.

भगतजी कहले – भगवन, हम कबो कवनो कुकर्म ना कइनी.

भगवान हंसले. कहे लगलें – भगत, तूं आदमी मुअवले बाड़ऽ. अपना गांव के
रामनाथ अहीर के भारी बेमारी आ सुते देवे के डाक्टर के सलाह के अनदेखा कऽ
के तूं रात रात भर लाउड स्पीकर पर अष्टयाम करवलऽ आ ओहसे ऊ मरि गइल. एतने ना बटेसर पांड़े के नाती के टेटनस भइल आ तू कीर्तन करवाये से बाज ना
अइलऽ, ई जनलो पर कि हल्ला से टेटनस के रोगी के बड़ा परशानी होला. नतीजा ई भइल कि ऊ बेचारा बच्चा मरि गइल.

भगत सुनके घबरा गइलें.

भगवान बड़ा कठोरता से कहलें – तोहार पाप देखि के तहरा के नरक में डाल देवे के हुकुम देतानी. ई सुन के भगत जी भागे के कोशिश कइले त दूत लोग धऽ
लिहल.

आपन भगतजी, जेकरा हमनी का हम धर्मात्मा बूझतऽ रहीं सन, नरक भोगऽ तारें.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

1 Comment

  1. भगतजी स्वर्ग के द्वार पे पहुँच के नरक में ठेला गइलें.टूट गइल सारा सपना भगतजी के.बीखर गइल आश. हो गइलें हताश .
    राउर रचना बा बड़ी खाश .
    जयंती पांडेय जी अच्छा लागल .
    गीतकार –
    ओ.पी .अमृतांशु
    09013660995

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