– जयंती पांडेय

एक दिन बाबा लस्टमानंद रात में सुतल रहले. अचानक ऊ सपना देखे लगले कि एगो बड़हन मॉल (नया जमाना के बजार) में दोकान देखते – देखते ऊ नरक के दुआर पर पहुंच गइल बाड़े. उनका आगे एक जना अऊरी रहे, जेकरा के बाबा लस्टमानंद चीन्हत रहले. ऊ रहे एगो अखबार के सम्पादक. बेचारे सम्पादक जी के नजर जसहीं जमराज पर पड़ल ऊ चिचिअइले. हालत तऽ बाबा लस्टमानंदो के पातर हो गइल रहे. बेचारे सम्पादक जी घिघियइले – महाराज हमार टाइम नइखे भइल. ई तऽ हजूर माई बाप, ई तऽ सेल के कमाल हऽ कि हम देखत-देखत इहां ले चलि आइल बानी, ना तऽ हमार अभी टाइम कहां भइल बा ?

यमराज मुस्कियइले, कहले, हां भइवा ई तऽ सेल के कमाल हऽ. जवन 90 परसेंट डिसकाउंट के बोर्ड हम धरती पर लगवले रहनी ई तऽ ओही के कमाल हऽ.

सम्पादक जी घिघियले, नरक में डिसकाउंट कइसन सरकार ? इहां तऽ आदमी के सजाय होला. इहां तऽ ऊ लोग आवेला जे धरती पर पाप करेला चाहे गलत काम करेला.

जमराज हंसले, अरे मानव तूं तऽ धरती पर ठाट बाट के सब साधन रखले बाड़ऽ, जे मन करेला ऊ बनावे लऽ. परखनली शिशु बना लेहलऽ, कवनों दिन अमरता के टानिक पी लेबऽ आ एहिजा केहु अइबे ना करी तब हमनी का करब सन ? एहि से हमनियो का एहिजा सब सुख सुविधा जोगाड़ करऽतानी सन. अब तूं ही लोग जे मीडिया में ऊंचा पद पर बाड़ऽ लोगिन ऊ लोग सब चोरन के पहिलका पेज पर छाप के हीरो बना देलऽ लोगिन. अब ऊ लोग जे इहां आयी तऽ कइसे रही लोग ?

जमराज के बात पर सम्पादक तनी घूम के देखे चहलें. देखि के अइले तऽ फटाफट फारम भरले आ धरती की ओर चल दिहले, परिवार ले आवे.

अतनही देखले तबले अचके में लस्टमानंद के आंखि खुल गइल.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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