– जयंती पांडेय

राहुल गांधी अपना चुनाव प्रचार में कई हाली कहले कि गांव के विकास के खातिर जवन रुपिया आवे ला तवना में से दसे पइसा मिले ला बाकी गायब हो जाला. काफी सोचला पर ई पता ना चलल कि के खा जाला. मन में 90 पइसा हजम करे वालन के बारे में जाने की लालसा बढ़ गइल. हाथ गोड़ फरके लागल, काहेकि दू दिन पहिलहीं खून टेस्ट करवले रहले जेह में पता चलल रहे कि खून में दसे प्रतिशत हीमोग्लोबिन बा, बाकी त पानी बा. अब ई राष्ट्रीय विषय पर सोचला से जवन दिमाग के मेहनत पड़त रहे ओह से उहो दस प्रतिशत पानी भइल जात रहे. अभी इहे सब सोचत रहनी कि कहीं बंवड़ियात रामभरोसी आ गइले.
का हो काका, बड़ा गंभीर बाड़ऽ कवनो बात बा का?
बतवनी कि भाई हम बिचार के हाईमार्ग पर दउरऽतानी.
राम भरोसी बोलले कि बुझाता कि नेतवन के भाषण सुनि के तहरो विचार के कब्ज हो गइल बा. साफ साफ बतावऽ त ओकर कवनो रस्ता निकालल जाई. हम कहनी, राहुल भइया कहि गइल बाड़े कि गांव व गरीबन के विकास के नाम पर एक रुपया में से 10 पैसे ही पहुंचेला. बाकी 90 पइसा बीचे में साफ हो जाला. हमनी के कौर के हड़प जाला. राम भरोसी जोर से हंसले, जइसे घोड़ा हिनहिनात होखो.

काका तहरा मालूम बा कि जवन बात राजीव गांधी कहले रहले तवने उनकर बेटा राहुल गांधी कहऽ तारे. जब उनका मालूम बा कि केंद्र से गांव में भेजल रुपिया में से दसे पइसा पहुंचे ला त उनका इहो मालूम होई कि ऊ नब्बे पइसवा से केकरा गाड़ी में पेट्रोल भराला. चाचा ई नेता लोग गरीब के बीच में डाल के अइसन राजनीति के जाल बीनले बा कि ओह फंस के गरीब बेचारा बी पी एल हो जाई आ ई लोग आउर अमीर हो जाई. बी पी एल माने सरकार एगो गरीबी के रेखा तैयार कइले बीया, गांव के गरीब लोग ओहू से नीचे चलि गइल बा. तबो ई लोग ओकर पाछ नइखे छोड़त अब ना जाने कहां भेजी लोग. विकास के नांव पर जे कुछ आवऽ ता ओहु पर ई उच्चकन के नजर पर गइल बा.
हम कहनी, राहुलो भइया भी त कुछ सोचिये के कहले होइहे.
राम भरोसी बोलले, चाचा राहुल भइया खाली बोले ले, सोचस ना. आ जे इनका भाषण के बारे में सोचे ला लोग चाहे जे लिखे ला लोग ओकनी के जमात अलगे होला. एकनी के ना कवनो गांव चाहे गरीब के विकास के जरूरत बा आ ना जानकारी राखल जरूरी बा. अब ई लोग जवन सुख सुविधा पावे ला ओही के बारे में बात उठावे ला आ नेता लोग उहे बोले ला. खास कर के चुनाव के मौसम मे जेहसे गरीब एही में बउराइल रहे. जब ई लोग के मतलब निकलि जाई त ना गरीब के बारे में बात करी लोग ना गांव के बारे में. तब ई लोग दोसरा बात पर बोली लोग. ई लोग के मतलब बड़ा दूर के होला. एही से ई लोग के देखावल रोशनी में मत जा आपन रोशनी खोज लऽ. राम भरोसी खइनी मलत चल गइले आ हम सोचत रहि गइनी कि साठ बरिस से ई बात हमनी का काहे ना समझ पवनी सँ.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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