पति के दबावे के फरमूला

jayanti-pandey

– जयंती पांडेय

बाबा लस्टमानंद के महिला संगठन के तरफ से कहल गईल कि कवनो हंसी के मसाला दऽ. बड़ा गड़बड़, महिला सशक्तिकरण के जमाना में जे कवनो उल्टा सीधा मजाक हो गईल चाहे कवनो उल्टा सीधा मतलब निकल गइल तऽ अलग झमेला. का करस, बड़ा सोच बूझ के ऊ सबसे पोपुलर मसाला जोहले कि बतावल जाउ कि पति से झागरा कइसे बेसाहल जाई. उनकर तर्क रहे कि पहिले जमाना के मेहरारू सब शांत सुभाव के होत रही सन आ आज के जमाना में मरदो लोग मेहरारुन से बड़ा डेराताऽ. कलकाता शहर में तऽ ‘पत्नी पीड़ित पुरुष पति संघ’ ले खुलि गइल बा. हालत इहां ले पहुंच गइल बा कि मरद लोग अतना डेरापुत हो गइल बा कि झगड़े ओरा गईल बा. डर बा कि पति पत्नी लड़ले ना भुला जाउ एही से पत्नी समाज के पति बेचारन से झगरा बेसाहे के तरीका बतावल जाउ. एह से मेहरारू लोग के रुतबा बढ़ि जाई.

तरीका ई बा कि मान लीं कि खाना बनावे में कवनो गड़बड़ी हो गइल तऽ पहिलहीं से अइसन जाल बिन दिहल जाउ कि मुंह में कौर रखते बेचारा पति भड़क जाउ. अब ओकरा खाना के कवनो गुण दोष समझे में ना आई. पतिदेव जसहीं टीवी चलवले कि बन क दी , कहीं कि माथा दुखाता, सुते जातानी, हाला बरदास नइखे होत. जे पति हारल होखे आ आराम करे के इच्छा होखे तऽ टीवी तेज चला दीं आ पतिन के जे पसंद होखो ऊ प्रोग्राम तऽ जरूर देखीं.

पति अगर खइला पर कंट्रोल करे के चाहे तऽ उनका पसंद के खूब तेल मसाला वाला रसोई बनाईं आ एह से झगड़ा करे में आसानी होई.

जवन काम ऊ करस ओह में जरूर कवनो कमी निकालीं सभे आ काम करे के दबाव बनवले राखीं आ एक के बाद एक काम के बहोझ बनवले राखीं. पति जे सिनेमा के टिकट ले आवे तऽ जरूर ओह दिन मत जाईं, माथ दरद के बहाना बना के पटा जाईं आ ई जरूर बता दीं कि आज हमार जीव नीमन ना रहे तऽ आजे तहरा जाये के मन कईल.

पति के चरित्र पर संदेह बनवले रहीं आ आफिस में काम करे वाली कवनो मेहरारू चाहे लईकी के नाम ले के झगरा करत रहीं आ पति के लाचारी के मजा लेत रहीं.
पति के रिश्तेदार लोग के सामने एकदम रोसा चढ़वले राखीं ताकि लोग बूझे कि राउर कतना रोब बा मरद पर. आ जब अपना नइहर से लोग आवे तऽ पति से दबा के काम लीं ताकि ऊ लोग बूझे कि उनकर बेटी भा बहिन केतना खुशनसीब बिया कि अइसन आज्ञाकारी पति मिलल बा.

पति कवनो समान कीन के ले आवे तऽ ओह में कवनो ना कवनो नुक्स निकाल दीं आ कहत रहीं कि तहरा कीने ना आवे. एह से पति जहां दबल रही आहिजे कीने बेसाहे खातिर रउरे के पइसा दीहि आ तिगुना दाम वसूल के नइहर वालन खातिर समान कीन के दुतरफा रोब बनायीं. पति के कहीं कि उनकर इज्जत बचा दीहनी.

इ सब फरमूला काम में लिहला से पति हमेशा कंपसल रही.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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