– जयंती पांडेय

जबसे बाबा अण्णा हजारे अनशन के जिद पर खड़ा हो गइले आ देस के लाखन लोग मोमबत्ती ले के एने ओने जमा होखे लागल तबसे दू गो चीज के दिन बहुर गइल. एगो गाँधी टोपी के आ दोसरे मोमबत्ती के. एकरा साथ भ्रष्टाचार आ बेईमानी पर लमहर लमहर भाषण होखे लागल. बाबा लस्टमानंद लमहर साँस खींच के कहले, हो रामचेला ई कुटिल कपटी जुम में अबहियों कतना लोग भेंटाता ई कहे वाला कि, हम आजु ले कवनो भ्रष्टाचार नइखी कइले. नाजायज पइसा के हाथ से छुअल का, हम त ओकरा इयोर तकबो ना करीले. हम एकदम पांकी में कमल नाहिन बानी. लेकिन जब उहे अदमिया के बारे में दोसर लोग लागे ला बखाने कि भाई, कौ दिन से उनुका के जानऽतारऽ. नंबर एक के बेईमान ह, पक्का कामचोर. आफिस में फाईल ओकरा लगे गइला के देर बा कि ओह में अइसन अइसन रोड़ा अँटका दी कि बस. कवनो काम ना होई. ऊ त करबे ना करी दोसरो के करे लायक ना छोड़ी. उहे खिसा ह कि “ना खाएब ना खाए देब, खयके बिगाड़ देब”. मोका नइखे कि चोरइहें त भ्रष्टाचार कहां से करीहें.

कुछ लोग में ई आदत होला कि अपना के एकदम पकहर कही आ दोसरा के बड़का चोत. कुछ लोग त असहुओं होला कि हर बात में किरिया खाला. किरियो अइसन जोरदार ढंग से कि कुछ कहल ना जा सके. कबहुं ताबीज निकाल के भगवान जी के छू के. आ जब खनाद होला त ऊ अइसन झूठा निकलेला कि मत पूछऽ. ऊ लोग दोसरा के महाबोका बुझेला. जान जा रामचेला कि हमार एक जाना परिचित बाड़े, सुरेश जी. एगो बड़हन कंपनी में काम करेले, बड़ा पइसा कमइले. जब भैंटइहे तब आपन बात एहिजे से शुरू करीहें कि हम आजु ले झूठ नइखीं बोलले. अरे भाई, कबहुँओ त बोलले होखबऽ. ना एकदम ना, आखिर बेर कब बोलले बानी हमरा इयाद नइखे. केहू केहू त कहियो देला कि ई इनकर अइसन झूठ ह जेकरा से बात शुरू करेले. फेर आगे बोलत जाले. अब त अतना पाक गइल बाड़े कि सुधरे के कवनो चांस नइखे. हमरा कहे के अर्थ ह कि आजुओ लोग बा जे थोथा आदर्श चिनगम अइसन चबात रहेला. मौका कुमोका ना देखे, बस शुरू हो जाला. कहे लागेला कि आदमी पइसा का पीछे पागल हो गइल बा. आखिर अतना पइसा के ऊ का करी. मुअला का बाद सब छूटि जाई. अइसन लोग पाकिट में ईमानदारी के साबुन ले के चलेला. जब मोका मिलल त सामने वाला के धो के एकदम चकाचक क देला लोग. बुझाला कि ईमानदारी के धर्मगुरू ह लोग. सामने वाला के कही, खूब खा तारऽ, तनी सम्हार के खा. धरइलऽ त ऊ का कहाला, नाक कटि जाई.

कई लोग त मजबूरी में ईमानदार होला. खाये के मोका नइखे त काई कइसे. कुछ लोग डेरापूत होला. एकदम दस पाँच रुपिया में संतोष कर लेला. कुछ लोग के पेट बड़हन होला, ऊ कहेला कि अब के पचीस पचास खातिर ईमान छोड़े जाउ. लेकिन जब लाख दू लाख के बात होला त देखऽ कइसे लार चूअऽता. कुछ लोग डर का मारे भ्रष्टई ना करे ला.

ई दुनिया में भ्रष्टाचार के परिभाषा बदल गइल बा. केहू के काम करवला के बदले जे लिहल जाला ओकरा के कमीशन, चाहे मिठाई, चाहे भेंट सौगात वगैरह कहल जाला. ई भ्रष्टई के श्रेणी में ना आवे. रामचेला जेकरे किओर झाँकऽ उहे भ्रष्ट निकली. ई दुनिया में केहू ईमानदार नइखे. बस ओकर रूप बदल गइल बा.

हो रामचेला ! ई जग ह भ्रष्टाचारी !


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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