बेइज्जत करे खातिर इज्जत भइल

jayanti-pandey

– जयंती पांडेय

बाबा लस्टमानंद देश के राजनीति ले के बड़ा हरान बाड़े. जब देखऽ तब कवनो ना कवनो बात ले के चर्चा करत रहेले. बाबा रामचेला के बोला के कहले कि, जान जा रामचेला आजुकाल बड़ा कठिन स्थिति बा. अब दू दिन पहिले के बात ह कि देश के एगो इज्जतदार परिवार के एगो इज्जतदार पुरनिया के कुछ बाहर के लोग इज्जत क दिहल. अब ऊ परिवार अपना जामा से बाहर हो गइल बा.

रामचेला कहले, एह में खिसियाये के का बात बा?

अरे तूं कहऽतारऽ कि खिसियाये के का बात बा. अरे जवन परिवार अपना पुरनिया के पूरा इज्जत ना दिहल ओह परिवार के पुरनिया के बाहर के लोग इज्जत दे रहल बा त खिसियाये के बात नइखे! तूं केहु के घर में ढुकि के ओह घर वालन के लूगा लूटबऽ त पिटइबऽ कि ना? एही से न खिसियाइल बा कि ऊ हमरा परिवार चाहे खनदान के आदमी रहे, आजुओ बा, काल्हुओ रही. तहरा का मतलब कि हम इज्जत करीं चाहे ना करीं. एगो समय रहे जब ऊ खनदान के लोग के लगे बहुत इज्जत आ मान मर्यादा रहे. कुछ त आपन रहे आ कुछ ऊ लोग खींच ले ले रहे. जइसे कहल जाला नु कि पइसा जे बा से पईसा के खींचे ला. ओसही ऊ लोग खींच लिहल. कतना रोड, कतना स्मारक, कतना योजना. जहां भेंटाइल खींच के अपना गुल्लक में डाल लिहल लोग. देश में केहु के गुल्लक एतहत नइखे. बड़का इज्जतदार खनदान हऽ एकदम लोकतंत्र नाहींन. जइसे लोकतंत्र में सबका कुर्सी ना भेंटाला ओसहीं एह में सबका इज्जत ना भेंटाला. कुर्सी जइसे तिकड़म से भेंटाले ओसहीं इज्जतो तिकड़मे से भेंटाला. अपना देश में जे इज्जत चाहीं त तिकड़मी भइल जरूरी बा. जे शराफत में रहि जाला ऊ हमेशा घाटा में रहेला. एही से बहुत लोग अपना देश में शरीफ आदमी के बुड़बक कहेला.

काहे कि केहु के सलामो करे के पहिले लोग सोचेला कि आखिर एह में हमार कवन फायदा बा. एही से जेकरा आपन परिवार ना पूछे ओकरा इयोर केहु ना देखे, अब एह हालत में ओकर केहु बाहर के आदमी इज्जत क दीहल त खलबली मचिए जाई. खनदान के लोग पूछे लागी, हमरा खनदान के लोग के इज्जत करे के कवन दरकार बा, तहरा खनदान में केहु नइखे का? ई बात तऽ कुछ-कुछ ओसहीं भइल कि तहरा घर में बेटी बहिन नइखे का.

जानऽतारऽ रामचेला, ई इज्जत कांड में एक तीर से दू गो निशाना लागल बा. जेकर केहु इज्जत ना करत रहे ओकर इज्जत हो गइल आ इज्जत ना करे वाला के नाक कटि गइल. जान जा रामचेला नकिये काटे खातिर ई कुल्ही काम भइल बा. माने बेइज्जत करे के खातिर इज्जत कइल गइल बा.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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