– जयंती पांडेय

बाबा लस्टमानंद एगो अखबार में छपवावे खातिर लोकपाल पर एगो लेख लिखले. लेख का रहे एकदम से तमाशा रहे. ऊ लिखले कि लोकपाल एगो अइसन फल हऽ जे ईमानदारन के मीठ आ बेईमानन के खट लागेला. जनता के खट मीठ दूनो. सरकारी अफसरन के ई बड़ा कसवे ला. आपन देश एगो गरम देश हऽ डाक्टरी के भाषा में एकरा समशीतोष्ण देश कहल जाला. कुछ लोग एकरा के जड़ी बूटी बूझेला आ बूझे ला कि एकरा सेवन से भ्रष्टाचार नामक बेमारी खत्म हो जाई. सत्ता पक्ष आ विपक्ष के लोगन में एकरा गुणावगुण के लेके भारी मतभेद बा. जइसे लोकपाल के चूरन कई बेमारी में काम आवे ला. एकरा बनावे के फारमूला हऽ दू चार गो संविधान के जानकार लोग, दू चार गो बड़बोला चाहे हो सके तऽ बहुबाचक लोग आ एगो भूखऽल रहे के आदी बूढ़ आदमी. सबके एक जगहा एकट्ठा कऽ लऽ आ ओकरा के कुतर्क के छुरी से गोद दीं. ओकरा बाद बयान के पानी में फुला दीं. आ ओकरा बाद आश्वासन के चाशनी में डभकाईं. जब एकदम पाक जाऊ तऽ ओकरा के बहस के धूप में सूखे के डाल दीं. एह से जे लोकपाल बनीं ऊ एकदम हलुक रही आ बिल्कुल हरजा ना करी, खाली सवाद बदल जाई. अफसर आ कर्मचारी ओकरा बड़ा चाव से खाई लोग. एह चूरन के सेवन से भ्रष्ट आ ताकतवर लोग ऊंच मनोबले प्राप्त करी. शिकायत करे वाला सांसत में पड़ी. जनता ई चूरन में थोड़का गुणकारी मसाला वगैरहो डाले के चाहऽ रहल बा जेहसे ई असरदायक बन जाय लेकिन सरकार सहमत नइखे. विपक्ष तऽ ई चूरन के ले के अब ले संशय में बा कि ई का हऽ. कुल मिलाके जनता, सरकार अउर विपक्ष के खींचतान में ई लोकपाल एगो रगड़ा बन रह गईल बा.

इहे ना लोकपाल चटनियो बने ला. एकरा खातिर आवश्यक सामग्री हऽ लोकपाल जैम – आवश्यक सामग्री – ताजा लोकपाल प्रस्ताव रूपी फल. अलग – अलग समूहन से मांगल. लगभग एक किलो झूठ भरोसा के चीनी, थोड़की सा अहंकार रूपी प्रिजरवेटिव.

एकरा बनावे के विधि हऽ पहिले लोकपाल के खूब बहस, बैठक, कानूनी अड़चन के आंच में ढंग से भाप लऽ. फेर नियम, बेबसी, अधूरा इच्छा के हाथ से कड़ेरे सान लऽ. ध्यान रहे कि कवनो बीज चाहे छिलका न रह जाए जे कि खात समय दांत में गड़ों. बेदांतो के लोग एकरा के चभुला के घोंट जाय. अब संवैधानिक मान्यता के अभाव के ठंडा पानी में रख दऽ. लऽ लोकपाल चटनी तैयार बा. ई चटनी से बुद्धि खुले ला.

ई एगो विवादास्पद फल हऽ. विशेषज्ञ एकरा बारे में एकमत नइखे लोग. एगो वर्ग कहेला कि ई अत्यंत फायदेमंद हऽ लेकिन सरकार एकर गूदा, पत्ता, छिलका सब निकाल देवे के चाहे ले. विपक्ष एकरा से लगाव नईखे. अब देश बूझ नइखे पावत कि ई खाइल जाउ कि उगिल दिहल जाउ.

एतना के बाद बाबा लस्टमानंद आपन लेख समेट दिहले काहे कि लोकपाल के समर्थक नवजुवक दल के लईका उनहीं की ओर लपकल चलल आवत रहले सन.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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