– जयंती पांडेय

रामनिहोरा. ऊ गांव -जवार के बड़ा पुरान नेता हवें. कौ हाली तऽ परधानी जीत भइल बाड़े. एक दिन भिनसहरे बाबा लस्टमानंद के दुअरा पर अइले. बाबा बैलन के सानी पानी दे के गोबर- गोथार करत रहले. नेताजी दूरे से पुकरले, का हो, का करऽ तारऽ ? बस दू गो माल बाड़े सन तऽ ई सब करहीं के परी. नेताजी बे-कहले चऊकी पर बइठ गइले. एने ओने ताक के कहले – तहार पोता-पोती कऊ गो बा ?

बाबा लस्टमानंद अंगुरी पर गिन के बतवले, दूनो बेटा लोग के मिला के चार गो लईकी आ एगो लईका. माने पांच.

नेता जी थोड़ा देर सोचले आ फेर कहले, तू एगो काम करऽ. नवका कैथोलिक स्कूल खुलल बा. दूनू बड़की पोतियन के ओही में नांव लिखवा दऽ. जीवन बन जाई.

लस्टमानंद के मुंह ई बात सुन के अचके में बवा गइल. कहले, नेताजी मजाक करऽ तानी. हमार बेंवत बा ओह में पढ़ावे के ? ओकरा फीस, डरेस में हम बिला जायेब.

नेताजी सुर्ती के पीक थूकि के कहले, ओकर कवनो चिंता नईखे. तूं दस बजे चलि आवऽ हमरा दुआरे, दूनो लइकियन के ले के. नांव हम लिखवा देब. एतना कहि के नेताजी चल दिहले. दोसरा दुअरा की ओर.

बाबा लस्टमानंद दस बजे दूनो नातिन के ले के जब नेता जी के घरे पहुंचले तऽ ऊहां उनकरा गांव आ आस पास के गांव के कम से कम 25 लोग जमा रहे. घंटा भर के बाद नेताजी निकलले आऽ चलि दिहले. इस्कूल के सामने पहुंचि के तऽ बाबा लस्टमानंद के होसे हावा हो गइल. कई बिगहा में बनल इस्कूल. कई गो कमरा. जब बनत रहे तऽ ऊ दूरे से देखस आ साध लागो कि हमरो नाती पोता एह में पढि़ते सन. ऊ सपना में डूबि गइले.

भीड़ देखि के गेट पर दरवान सबके रोकि दिहलस. नेताजी आपन परिचय दिहले तऽ ऊ खाली उनहीं के जाये दिहलस. नेताजी भीतर ढुकि गइले. घंटा भर बाद मुस्कियात निकलले. कहले, काल्हु सब आ के एडमिशन फार्म ले जाईं. सरकार के लइकिन के मुफ्त शिक्षा के गारंटी के कानून के चलते सबके नांव फ्री में लिखा जाई. सब लोग खुशी- खुशी ओहिजा से चलि आईल. बाबा लस्टमानंद रात भर सपना देखले कि उनकर दूनो नातिन कइसे डरेस पहिन के इस्कूल जात बाड़ी सन. बाबा के मन एह सरकार के प्रति एकदम गदगद हो गइल. ऊ अपना मोबाइल में रिचार्ज भरवइले आ बेटा के पंजाब में फोन कऽ के बतवले कि दूनू बेटिन के अंग्रेजी इस्कूल में काल्हु नांव लिखा जाई. अब खानदान सुधर जाई.

दोसरका दिने जब ऊ पहुंचले तऽ दरवान कहलस, अभी फार्म नइखे आइल काल्हु आवऽ जा. दोसरा दिने फार्म तऽ मिल गइल. बाकिर पूरा फार्म अंग्रेजी में. अब का होखो. मास्टर गनेसी लाल के इहां जाके फारम भरववलें. जब दस बजे इस्कूल पहुंचले तऽ उहे दरवान कहले, एह में गरीबी रेखा से नीचे वाला कार्ड के फोटो कापी लगा के ले आवऽ (बी पी एल कार्ड) . अब बाबा दउरले. शहर गईले, फोटो कापी करवले आ दोसरा दिने लेके हाजिर. दरवान देखलस आ कहलस, एह में राशन कार्ड के कापी कहां बा ? अब फेर ऊ दउरले. दोसरा दिने अतवार रहे आ ओकरा बिहान भइला एगो त्योहार के छुट्टी रहे. तिसरका दिने जब ऊ फार्म ले के गइले तऽ भीतर जाके जमा करावे के कहलस दरवान. बाबा जब भीतर गइले तऽ उहां नेताजी बइठल रहले आ मैम से बतियावत रहले. बाबा के फार्म कवनो गंदा कागज जइसन हाथ में ले के मैम देखली आ कहली…ओह नो ! एडमिशन इज ओवर.

बाबा के खाली नो एडमिशन बुझाइल. कहले, बहिन जी नौ ना, खाली दू गो पोती के नांव लिखावे के बा. मैम तऽ बहिन जी सुन के भड़क गइली. टूटहा हिंदी में बोलली – जाओ इहां से. बाबा नेताजी के ओर देखले तऽ ऊ दोसरा ओर ताके लगले. ओने से उनकर नातिन आवत रहली सन. बाद में पता चलल कि बीपीएल के भीड़ के डर देखा के नेताजी अपना नाती पोता के नांव लिखवा लिहले.

आंख में दूटल सपना लेके बाबा घरे अइले. सपना के साथ- साथ दस दिन माल मवेशी की ओर से ध्यान हटला से गाय के दूध घट गइल रहे.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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