राम निहोरा अपना गाँव जवार के बड़ा पुरान नेता हउवें. कौ हाली त परधानी जीत गइल बाड़े. एक दिन भिनसहरे बाबा लस्टमानंद का दुअरा पर अइले. बाबा तब बैलन के सानीपानी दे के गोबर गोथार करत रहले. नेताजी दूरे से पुकरले, का हो, का करऽतारऽ?

बाबा जबाब दिहलें, बस दू गो माल बाड़े सन त ई सब करहीं के पड़ी. तबले नेताजी बे कहले चउकी पर बइठ गइले. एने ओने ताक के कहले, तहार पोता पोती कव गो बा?

बाबा लस्टमानंद अंगुरी पर गिन के बतवले, दूनो बेटा लोग के मिला के चार गो लईकी आ एगो लईका. माने पाँच.

नेताजी थोड़ देर सोचले आ फेर कहले, तू एगो काम करऽ. दुनु बड़की पोतियन के नाम नवका खुलल कैथोलिक स्कूल में लिखवा द. जीवन बन जाई. लस्टमानंद के मुँह ई बात सुन के अचके में बवा गइल. कहले, नेताजी मजाक करऽतानी? हमार बेंवत बा ओह में पढ़ावे के? ओकर फीस, डरेस में हम बिला जायब.

नेताजी सूर्ती के पीक थूकि के कहले, ओकर कवनो चिन्ता नइखे. तूं दस बजे चलि आव हमरा घरे. दूनो लइकियन के ले के. नांव हम लिखवा देब. एतना कहि के नेताजी चल दिहले दोसरा दुअरा की ओर.

बाबा लस्टमानंद दस बजे दूनो पोतिन के ले के जब नेताजी का घरे चहुँपले त ओहिजा अगल बगल के गाँव से कम से कम पचीसन लोग जमा रहे. घंटा भर बाद नेताजी निकलले आ चलि दिहले. स्कूल का सामने पहुँचि के त बाबा लस्टमानंद के होसे हवा हो गइल. कई बिगहा में बनल स्कूल, कई गो कमरा. जब बनत रहे त ऊ दूर से देखस आ साध लागो कि हमरो नाती पोता एहमें पढ़िते सँ. ऊ सपना में डूबि गइले. भीड़ देखि के गेट पर दरवान सबके रोकि दिहलस. नेताजी आपन परिचय दिहले त ऊ खाली उनही के जाये दिहलस. नेताजी भीतर ढुकि गइले. घंटा भर बाद मुस्कियात बाहर निकलले. कहले, कालहु सब आ के एडमिशन फार्म ले जाईं. सरकार के लईकियन के मुफ्त शिक्षा के गारंटी कानून का चलते सबके नांव फ्री में लिखा जाई. सब लोग खुशी खुशी ओहिजा से चल आइल.

बाबा लस्टमानंद रात भर सपना देखले कि उनकर दू गो पोती कइसे डरेस पहिन के स्कूल जात बाड़ी सँ. बाबा के मन सरकार का प्रति एकदम गदगद हो गइल. ऊ अपना मोबाइल में रिचार्ज भरवलें आ बेटा के पंजाब फोन कर के बतवलें कि दुनु बेटिन के अंग्रेजी स्कूल में काल्ह नांव लिखा जाई. अब खानदान सुधर जाई.

दोसरका दिने जब ऊ पहुँचले त दरवान कहलस कि फार्म अबही नइखे आइल, काल्हु आवऽ. दोसरा दिने फार्म त मिल गइल बाकिर पूरा फार्म अंगरेजी में रहुवे. अब का होखो? मास्टर गनेसीलाल किहां जा के फारम भरववले. जब दस बजे स्कूल चहुँपले त दरवान कहलसि कि एगो गरीबी रेखा से नीचे वाला बीपीएल कार्ड लगा के ले आवऽ. अब बाबा दउरले. शहर गइले, फोटो कापी करवले आ दोसरा दिने ले के हाजिर. दरवान देखलस त कहलस कि एहमें राशन कार्ड के कापी कहाँ बा? अब ऊ फेर दउरले. दोसरा दोिने अतवार रहे आ ओकरा अगिला दिने त्योहार के छुट्टी. तीसरा दिने जब ऊ फार्म ले के गइले त दरवान भीतर जा के जमा करावे के कहलस. जब बाबा भीतर गइले त उहाँ नेता जी बइठल रहले आ मैम से बतियावत रहले. बाबा के फार्म कवनो गंदा कागज लेखा हाथ में ले के मैम देखली आ कहली, ओह नो! एडमिशन इज ओवर.

बाबा के खाली नो एडमिशन बुझाइल. कहले बहिनजी नौ ना खाली दू गो पोती के नांव लिखावे के बा.

मैम त बहिनजी सुनते भड़क गइली. टूटहा हिंदी में बोलली, जाओ इहां से!

बाबा नेताजी का ओर देखले त नेताजी दोसरा ओरि देखे लगले. ओने से नेताजी के पोतिन आवत रहली सँ.

बाद में पता चलल कि बीपीएक के भीड़ के डर देखा के नेताजी अपना नातीपोता के नांव लिखवा लिहले. आँख में टूटल सपना लेके बाबा घरे अइले. सपना देखे में दस दिन से माल मवेशी का ओर से धेयान हट गइल रहे आ एह चलते गाय के दूध घट गइल रहे.

– जयन्ती पाण्डे

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