– जयंती पांडेय

जब दुनिया भर में तरक्की के बयार बह रहल बा त बाबा लस्टमानंद के गाँव कइसे अछूता रहि जाई. ओह गाँव के जे सड़क पहिले ईंटा के रहल ह, ना त अलकतरा टूटल टाटल, अब उहाँ सीमिंट के रोड बन गइल बा आ गाँव के लइका दहेज के मोटर साइकिल ले के ना त बाबूजी चाचा भईया के बहरा के कमाई से मोटर साइकिल ले के दिन भर दनदनात चलऽता लोग. गाँव में मोटरसाइकिल पर अक्सर तीन लोग बइठेला. जे चलावेला ऊ एक हाथ में मोबाइल लिहले रहेला आ लगातार बतियावत रहेला. ओकनी के देख के बुझाला कि ई रफ्तार में जबे मोटरसाइकिल लड़ल त बूझि जा कि दू एक जाना बांचियो गइल लोग त हाथ गोड़ नकाम हो जाई. गाँव में सड़क के किनारे खड़ा हो के देखला पर बुझाला कि गांव एगो रेस में शामिल हो गइल बा. ओह रेस में पैदल से लेके सायकिल, आटो आ ट्रैक्टर वाला सब जेतना सवारी गाड़ी बाड़ी सन सब शामिल हो गइल बा. सब बेतहाशा भाग रहल बा. केहू समुझावल सुने के तइयार नइखे. जे समुझावे के साहस करबो करे केहू त उलट के जवाब सुन ली. पढ़े के कहऽ त सुने के पड़ेला कि पढ़लऽ नऽ, का कमातारऽ? हम अरब चलि जाइब कर्जा ले के आ तहरा ले बेसी कमायेब.

गाँव के तरक्की के उदाहरण ह कि हर घर में मोटरसाइकिल आ हर हाथ में मोबाइल आ पाँच सात गाँव पर एगो युरोपियन यूनियन के मनी ट्रांसफर आफिस आ ना त बैंक के एटीएम मशीन. मशीन के शीशा वाला रुम में जब ले भीड़ ना लागे तब ले मजा ना आवेला. अतवार के एटीएम बंद रहेला आ अनदिना ओकरा भीतर गुटखा आ सूर्ती बिकाला. भीतर भीड़ लागेला आ बाहर लाइन. जदि आप एटीएम के बहरा लाइन में खड़ा रहीं आ भीतर से लोग के बाहर निकले के इंतजार करीं त पब्लिक आपके धक्का दे के भीतर ढुका दी, फुहरपातर बात बोनस में सुनाई.

अगर आप बैंक में जा के शिकायत करेब त केहू धेयान ना दीही उलटे लोग आपके अइसन नजर से देखी कि कहाँ से मुँहफइल आ गइल.

बैंक के कर्मचारी समझाई कि आप सभ्य आदमी हईं, बाद में आ के पइसा निकाल लेब. लेकिन बाद में कब ? बैंकिग समय का बाद जायेब त एटीएम बंद आ बैंक का समय में जायेब त बरदाश्त के बाहर भीड़. दिन में अगर कभी भीड़ ना रहे त बूझ लीं मशीन खराब.

गैस लाइन से मिली लेकिन ब्लैक में गांव के पांड़े जी का दोकान पर जब चाहूं, जेतना चाहीं, ओतना भेंटा जाई. शिकायत कइला पर सुने के मिलेला कि घर में भैंटा जा ता त अतना हरानी का ? आ सुविधा खातिर पइसा त देवहीं के पड़ी. गाँव में सबसे बड़हन आदमी ऊ होला जे सिपाही जी के खियावत पियावत होखो. आप केतना पढ़ल बानी एकर कवनो कीमत नइखे, आप घर में केतना रुपिया भेज तानी आ आपके बाल बच्चा केता पइसा फूँकऽता इहे आप के स्टेटस के निशानी ह. हमरा गाँवे आईं आ देखीं कि भारत के गाँव केतना तरक्की कइले बा. लेकिन होशियारी से आएब ना त हमहुं कुछ ना कर पायेब.


जयंती पांडेय दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. हईं आ कोलकाता, पटना, रांची, भुवनेश्वर से प्रकाशित सन्मार्ग अखबार में भोजपुरी व्यंग्य स्तंभ “लस्टम पस्टम” के नियमित लेखिका हईं. एकरा अलावे कई गो दोसरो पत्र-पत्रिकायन में हिंदी भा अंग्रेजी में आलेख प्रकाशित होत रहेला. बिहार के सिवान जिला के खुदरा गांव के बहू जयंती आजुकाल्हु कोलकाता में रहीलें.

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