– ओ. पी. सिंह


एह घरी फैशन हो चलल बा डॉक्टरन के कवनो ना कवनो बहाने ठोकाई कइला के. गरीब के जोरू भर गाँव देवर. जेकरे मन करी आके चुहल क जाई. सड़क प हादसा हो गइल. लाद फाद के अस्पताल ले आवल गइल. अपराधी गोली मार के आराम से टहलत निकल गइल. घवाहिल के अस्पताल चहुँपावल गइल. बेचारा बच ना सकल. मार डॉक्टर के. बचवलसि काहे ना. आ अगर डॉक्टरन का तरफ से अइसनका हुल्लड़बाजन के ठोक दिआइल, त योगी जइसन सीएम कहीहें कि गलत बाति बा. परिजन का साथे मार पीट ना होखे के चाहीं. एको बेर ई ना कहीहें कि डॉक्टरन से मारपीट आ बेहूदगी मत करे लोग. काहे कि उनुका त वोट के फिकिर बा.
बबुआ के जनम का खुशी में लाखों के खरचा हो जाई बाकि डॉक्टरन के हजार सौ के फीस बरदाश्त ना होखी. डॉक्टर के फीस कतना होखे क चाहीं एकर उपदेश देबे वाला कबो ना कहीहें कि वकील भा सीए के फीस कतना होखे के चाहीं. आफिस में घूस कतना लागे के चाहीं. सरकारी अस्पतालन में दवाई ना रही बाकि बाहर के दवाई मत लिखसु डॉक्टर. अगर डॉक्टर एक बेर योगी जइसन सन्तन के बात मान के नियमानुसार काम करे लागसु त रोजे आउटडोर में मथफोड़उवल के इन्तजाम हो जाई. अइसनो नायाब नमूना बा लोग जे डॉक्टर के निहोरा क के बाहर के दवाई लिखवा लीहें आ तुरते उहे परची ले के चलि जइहन अधिकारियन का लगे कि देखीं बाहर के महँग दवाई लिखले बावे डॉक्टर. कमीशन के कमाई का फेर में.
डॉक्टरन के फजीहत के तुलना सेना का जवान आ पुलिस के सिपाही छोड़ केकरो से ना कइल जा सके. सेना पुलिस आ डॉक्टर ला ना त परब त्योहार होला ना कवनो ड्यूटी आवर के सीमा. लगातार खटावत रहीं जबले मन करे. हँ कबो कबो सेना आ पुलिस के जवान एह अतहत से अँउजिया के अपना अफसर के भूंज जरुर देले बाकिर कबो सुनले बानी कि कवनो डॉक्टर अपना अधिकारी के खून कइले होखे. जानत आ मानत बानी कि डॉक्टरन का जमात में बहुते कुछ सड़ल बा. आ एही चलते पूरा डॉक्टर समाजे के निशाना प ले लीहल गइल बा. बहुते सरकारी डॉक्टर अलगा से फीस लिहले बिना ना मानसु आ एह फेर में दूचार गो गारी सुनला से ओह लोग का सेहत प कवनो असर ना पड़े, पाकिट भारी होखत रहे के चाहीं. ओहनी के गरियावत धूसारत पब्लिको के आदत पड़ि गइल बा सगरी डॉक्टरन से वइसहीं पेश आवे के. एही से शुरुए में कहले बानी कि – आपन धियवा नीमन रहीत त बीरान पारीत गारी ?
एगो छोट वाकया याद पड़ल बा. एगो इन्कमटैक्स कमिश्नर के भउजाई के आपरेशन होखे के रहल. कमरा खाली ना रहल आ मरीज के बेटा अपना कमिश्नर चाचा के रिफरेंस देत हड़कावे लागल कि रूम त देबहीं के पड़ी. त हम ओकरा के समुझवनी कि बबुआ कमिश्नर तोहर चाचा हउवन तू ना. आ ऊ हद से हद हमनी के आयकर का जाल में फँसा सकेले. बाद में थोड़ बहुत ले दे के कामो हो जाई बाकि अगर डॉक्टर आपन हाथ के सफाई देखा दिहलसि त सोचला बाड़ का हो सकेला. बाकिर ना, तू जानत बाड़ कि तोहर बाप चाचा वाला आदत अबहीं डॉक्टरन के नइखे लागल. ऊ अपना मरीज साथे कबो गलत ना कर सके.
मानीं कि डॉक्टरो एही समाज के जीव ह. ओकरो सर सामान खरीदे होला, बचवन के पढ़ावे होला, बेटा बेटी के बिआह के खरचा ओकरो होला. बाजार से लीहले आफिस ले हर जगहा डॉक्टरन से अधिका दाम लिआला बाकिर डॉक्टर से उमेद कइल जाला कि ऊ बिना फीसे के इलाज क देव. हमरा इहाँ अइब त का का ले अइबऽ ? तहरा किहाँ जाएब त का का खियइबऽ ?

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