– ओ. पी. सिंह


महफिल अपना शबाब पर रहुवे. नाच मण्डली के मलकिनी साज वालन का पीछे बइठल नचनियन के जोश बढ़ावत रहली. मसनद के सहारा लिहले बाबू साहब नाच के आनन्द लेत रहलन. नाचत लउण्डा गाना उठावे आ कुछ कुछ देर पर बाबू साहब के धेयान खींचे के कोशिश करत रहुवे. बाकि बाबू साहब ओकरा पर धेयाने ना देत रहलन. महफिल में चारो तरफ से लौण्डवा के इशारा करत रहे लोग बाबू साहब पर अँचरा ओढ़ावे के. आखिरकार नाचत लौण्डा नयका गाना उठवलसि कि – कहि देहब ए राजा राति वाली बतिया. आ गावत गावत जाके बाबू साहब के अँचरा ओढ़ा दिहलसि. बाबू साहब के बाँह फड़कल आ लागल कि अब उठल. बाकि महफिल के परम्परा देखे जाने वाला बाबू साहब चुप रहि गइलन आ पाकिट से एगो नोट निकाल के ओकरा के दे दिहलन. लौण्डा आदाब बजावत उठल आ फेर महफिल में कूदे लागल. ओकरा बुझाइल कि बाबू साहब के ई गाना नीक लागल बा. ओने लोग सन्न रहुवे कि पता ना कवन बाति कहि देबे के बात करत बा ई लौण्डा. बाबू साहब याद करे के कोशिश करत रहलन कि पता ना ससुरा कवन बाति बता देबे के बात करत बा. लौण्डा बाबू साहब के चेहरा पर सोच के लकीर देखि के सोचलसि कि तीर निशाना प लागल बा. आ अब ऊ हर कुछ देर बात गाना के टेक लेत बाबू साहब के अँचरा ओढ़ावल शुरू क दिहलसि कि – कहि देहब ए राजा राति वाली बतिया ! बाबू साहब का दिमाग में फ्लैश बैक चलत रहुवे आ ऊ हर बेर ओकरा के नोट थमावल जात रहलन. ढेर देर ले इहे क्रम चलत रहल. आखिरकार बाबू साहब के याद आइल कि रात दिशा मैदान करे निकलल रहलन त बगइचा में मइला का बगल में गिरल अमरूद देखि के ललच गइल रहलें आ अमरुदवा धो के खा गइल रहलन. शायद लउण्डवा इहे देखि लीहले होखी. नोट देत देत पाकिटवो खाली हो गइल रहुवे, से खिसियात कहलन कि – जो ना ससुरा, कहि दे कि मइला पर गिरल अमरूद खा लिहले रहीं. पूरा महफिल ठहाका से हिल गइल. लागल कि भूकम्प आ गइल. ओने लउण्डवा के खुशी के ठेकान ना रहुवे. मण्डली में ओकर नौकरी खतरा प रहुवे. ओकर नाच आ गाना कबो एह जोग ना लागे कि महफिल सम्हार सकी. आ ओकरा एगो मौका के तलाश रहल कि कवनो तरह ओकर धाक बनि सके मण्डली में. आ अब ओकर नौकरी असालतन हो जाए के उमीद बन गइल रहे.
पिछला हफ्ता कुछ अइसने बात भइल. बबुअवा छिरियाइल रहुवे कि हमरा के बोले से रोकल जात बा. काहे कि हमरा बोलते भूकम्प आ जाई आ एही चलते मुनीम जी के हवाई उड़त बा. लोग पूछत बा कि बोले से के रोकले बा तहरा के ? ओहिजा नइखे बोले दीहल जात त एहिजे बोल द. बाकि बबुअवा ओतना बुड़बक ना ह जतना लोग ओकरा के बूझेला. जानत बा कि बहरा बोलब त सबूत देबे के पड़ जाई. भितरा बोलब त नाजाइजो बात चल जाई आ ओकरा प कवनो कार्रवाई ना कइल जा सके. पलटीवाल अलगे परेशान बा कि ओकर पेटेन्ट स्टाइल के बबुअवा चोरावत बा. सभका याद बा 370 पन्ना के सबूत, बाकि सरकार बनते सगरी सबूत भुला गइल. नेता के भाषण हाथी के दाँत लेखा होला. बेशकीमत, बाकि खाए का कामे ना आवे. खाए वाला दाँत अलगा होला आ ऊ लउके ना. कुछ लोग का त अँतड़ीओ में दाँत होला. बबुअवा के सोचे के चाहीं कि अगर मुनीम जी चाह लेसु त ओकरा के कच्चे चबा जइहें आ कवनो निशानो ना मिली. आजु ले नइखे मिलल कवनो सबूत मुनीम जी का खिलाफ. मुनीम जी कवनो कच्चा खिलाड़ी ना हउवें. हो सकेला कि जब रउआ एकरा के पढ़त होखब तब ले एह खेल के राज खुल गइल होखी. हमरो इन्तजारे बा.

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