केहू बुझलें पियाज, केहुआइन बुझली अदरख – बतंगड़ – 90


समय अइसन खराब हो गइल बा कि बाबा दादा का जमाना से चचल आवत कहाउतो कहे लिखे में डर लागत बा. चैनल का पैनल पर एकाध बेर कुछ गलतो कहि के बाच सकीलें बाकिर अखबार आ छपल सामग्री में ऊ आजादी ना मिले. काहे कि एक बेर लिखा-छपा गइल त हमेशा ला सबूत बन गइल. गाँधी बाबा के बनावल शब्द हरिजन देखते देखत पॉलिटिकली गलत होखे लागल त लोगबाग दलित शब्द के इस्तेमाल करे लागल. अब सुने में आवत बा कि अदालत एकरो पर रोक लगावल चाहत बिया. ओकरा मंजूर नइखे कि खबरन का मथैला में एह दलित शब्द के इस्तेमाल होखे. ई सोचिए के मन परेशान हो जात बा कि अब – कवन जात हो जी – फेम के पत्रकारन जइसन लोग आपन चालबाजी कइसे चला पाई. चुनाव आवते गिनवावे लागेला लोग कि एब इलाका में एतना राजपूत, एतना ब्राह्मण, अतना कायस्थ, अतना भूमिहार, अतना यादव. अतना कोयरी, अतना कुर्मी, अतना दलित वगेरह बाड़ें. बाकिर ई कबो सुने के ना मिले कि फलां इलाका में अतना सुन्नी, अतना शिया, अतना अशरफ, अतना पहमाजा, अतना बरेलवी, अतना देहलवी वगैरह बाडें भा ईसाईयन के अलग अलग जाति के अतना अतना लोग बा. परिणाम उहे होला जवन अइसनका पत्रकार आ नेता चाहेलें. हिन्दूवन के बाँट-काट के राख दीहल जाला आ ओने चर्च आ मस्जिदन से आदेश-निर्देश जारी होखत रहेला कि मोदी के भोट नइखे देबे के. अगर इहे बाति शंकराचार्य, पंडित, ज्योतिष कहे लागसु त होखे लागी हल्ला कि साम्प्रदायिकता के पसार हो रहल बा. फिरकावाराना भा कम्यूनल हरकत-बयानन के केहू चर्चा ना करे काहें कि एह देश में जवने कुछ हिन्दू से जुड़ल बा ओकरा के साम्प्रदायिक मान लीहल गइल बा.
अइसने माहौल में एक दिन उहो देखे के मिलल जब सगरी चैनल संघ के कार्यक्रम के जियतार प्रसारण करे में लागल रहलें. इहां ले कि परेड-मार्च करतो घरी चैनलन के कैमरा एने से ओने ना भइल. पर साल जब विजयादशमी का मौका पर सरसंघचालक के संबोधन के प्रसाऱण दूरदर्शन से भइल रहे तब सगरी सेकूलरन का छाती पर साँप लोटे लागल रहुवे. बाकिर अबकी संघ के जवन मौका आ प्रचार मिलल ओकरा ला ऊ करोड़ो खरचो करीत त ना मिल पाइत. ओह दिन सभकर धेयान लागल रहुवे कि प्रणव दा का कहीहें. कांग्रेस के साँप सुँघाइल रहुवे कि पता ना दादा कवन बाति कवना तरह से कह दीहें. केहू कुछ कहत रहे केहू कुछ. लोग के अनुमान रहुवे कि पहिले प्रणव दा के संबोधन होखी आ ओकरा बाद सरसंघचालक उनुका बाति के जरुरत मुताबिक जबाब दीहें. बाकिर भइल उलुटा. हालांकि एकरा के सही मायने में उलुटा ना कहल जा सके काहें कि एह तरह के कार्यक्रम नागपुर में हर साल होले आ हर साल कवनो ना कवनो गैर संघी व्यक्ति आपन बात स्वयंसेवकन का सोझा राखेलें जवना के संघ अपना राह के पाथेय मान के ग्रहण करेला. काम के बाति राख लेला आ फालतू के बाति हवा में उड़ा देला. अबकिओ संघ प्रमुख अपना संबोधन में पहिलही कह दिहलें कि आजु का बादो संध संघे रही आ प्रणव मुखर्जी प्रणव मुखर्जिए रहीहें.
बाकिर कमाल कइलें प्रणव दा. अइसन संबोधन दिहलें जवना के हर आदमी अपना हिसाब से बखान कर सकेला. जेकरा पियाज बूझे के बा से पियाज बूझी आ जेकरा अदरख से मतलब ऊ ओकरा के अदरख बताई.
अलग बाति बा कि संबोधन का आखिर में उनुकर कहल वंदेमातरम के कवनो तरह रफू ना कइल जा सके. मुसलमान आक्रमणकारी आ भारतीयता के पचावे में समय लागी सेकूलर जमात के.

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