– ओ. पी. सिंह


दुअरा सवतिया के पिया के बरतिया,
देखि देखि फाटे रामा पथरो के छतिया.
जिनिगी के जरेला सिंगार, दइबा दगा कइलें.

एह घरी स्मार्टफोन के जमाना बा आ लोग सबेरे के गुड मार्निंग से ले के देर रात के गुड नाइट कइला का बीच में व्हाट्सअप प तरह तरह के ज्ञान छींटत रहेला. अचरज होखेला कि अतना ज्ञान-चरचा होखला का बादो देश-समाज से गलत बाति भा आदत बिलात काहे नइखे. बाकिर बाति उहे बा कि जब उपदेश के मौका मिलेला त लोग सुनावेला टन भर, सुनेला मन भर आ लेबेला कन भर. दिमाग खाली राखत फारवर्ड करत रहला में सुविधा इहे रहेला कि एह कान से सुनि के ओह कान से निकालत रहि सकीलें. बीच में दिमाग लगवला से परेशानी हो जाई. व्हाट्सअप प मिलत ज्ञान आ चुनाव का दौरान नेतवन के भाषण एके जइसन होला. पोस्ट भा फारवार्ड करेवाला जइसहीं नेतो लोग जानेला कि तनिके देर बाद केहू के कुछ इयाद नइखे रहि जाए वाला. अगर इयाद रहि जाइत त घोटाला आ भठियरपन के आरोपिए भर ना, सजा पा चुकल चारा-चोरो उपदेश बघारत ना भेंटइते. पूरा देश लूट के आपन खजाना भर लेबे वाली महारानी आ उनुकर राजकुमार गरीबन के नाम के दुहाई ना दीतन. एगो साइकिलो खरीदे के औकात ना राखे वाला लोग अरबो-खरबो बिटोर लिहला का साथही गरीबन के रहनुमा बने के हिमाकत ना करीत. अगर सभ होखत बा त बस एही भरोसे कि जनता के याददाश्त कमजोर होला.

अब रउरा सभे सोचत होखब कि एक सुर उठा के अचके दोसर ताल काहे उठा लिहनी हम. बात शुरू कइनी सवतिया के दुअरिया के आ चहुँप गइनी नेतवन के गिरेबान धरे. बाकि बतंगड़ अगर कवनो सलीका से होखे लागे त ऊ बतंगड़ कइसे रहि जाई. तब त ओकरा के प्रवचन भा परिचर्चा में राखे के पड़ि जाई. एही चलते हम गोंड़ऊ नाच का तरह एह ठेहा से ओह ठेहा प कूदत रहीलें. सोचले रहीं कि भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के सवाल उठइतीं आ शुरू करते इयाद आ गइल व्हाट्सअप प पढ़ल एगो पोस्ट. नदी किनारे बइठल एगो कवि जी देखलन कि दही पर चोट मारे जात एगो कउवा के दही वाला ढेला मरलसि आ ढेला अतना जोर से लागल कि कउववा ओहिजे मर गइल. कविजी ओहिजे एगो लाइन पत्थर प लिख दिहलें कि – काग दही प जान गँवाओ. बाद में अपना प्रेम से निराश एगो नवही जान देबे आइल त ओकर नजर लिखलका प पड़ गइल. ऊ पढ़लसि – का गदही प जान गँवाओ. पढ़ के ओकर ज्ञान खुलल कि का एगो लइकी ला जान देबे चलल बानी आ खुशी खुशी लवटि गइल. ओही तरह कागज के हेर फेर में परेशान एगो व्यापारी जान देबे आइल आ ओकरो नजर एह लिखलका प पड़ गइल. ऊ पढ़लसि कि – कागद ही प जान गँवाओ. सोचलसि कि का कागजात का परेशानी से अकुता के जान देबे चलनी ह. उहो लवटि गइल.

हमहूं एगो गीत के मुखड़ा – दुअरा सवतिया के पिया के बरतिया – लिख के सोचे लगनी कि हिन्दी आ भोजपुरी के सवतिया डाह के चरचा ले के चलल बानी बाकि चुनाव का मौसम में दोसरा तरफ जात वोट आ फगुआ का मौसम में जीजा-साली के आशनाई से परेशान मेहरारू एकरे के अपना-अपना तरीका से अलग-अलग लोग अलग-अलग अरथियाई. सुबरन को ढूंढ़त चले कवि, कामी और चोर वाली बाति हो जाई. अब जेकरा जवन बुझाय से बूझे बाकि हम त इहे कहब कि भोजपुरी के छोटकी बहिनिया हिन्दी अपना रूप आ सिंगार का गरुर में अईंठल चलत बिया त महज एही चलते कि ओकरा राज्याश्रय मिल गइल बा. आ एही चलते भोजपुरिओ वाला लोग आपन महतारी छोड़ मउसिए का तरफ धवले जाति बा. अब एह बुड़बकन के के समुझावे कि भोजपुरी के मान हिन्दी के अपमान ना होखी. बड़की बहिनिया के पूत हमेशा से मउसी के मान रखले बाड़ें आ आगहूं राखत रहीहें. बाकि बुड़बक बुझावे से मरद !

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