– ओ. पी. सिंह

अगर कवनो समाज के खतम करे के होखे त ओकरा नाभि प चोट करे के चाहीं. आ समाज के नाभि ओकरा भासा, ओकरा परम्परा, ओकरा संस्कार, ओकरा उत्सवन में होला. कई बेर ई चोट ओह समाज के भलाई का नाम प लगावल जाला, ओकरा के सुधारे सभ्य बनावे खाति कइल जाला. भोजपुरियो का साथे अरसा से अइसने खुरचाली हो रहल बा. आम आदमी के भासा भोजपुरी के अपना के पढ़ल-लिखल-सभ्य माने वाला कुछ लोग अपना खुरचाली में श्लील बनावे प लागल बा. ओहु लोग के मालूम बा कि श्लील होखते भोजपुरी के नींव हिल जाई. आम आदमी एकरा से दूर जाए लगीहें आ अपना के सभ्य-श्लील बतावे वाला लोग के तब मनसा पूरन हो जाई. ई लोग त भोजपुरी का नाम प कई गो संस्थो चलावेला जवना के हर काम हिन्दी में होखेला. आ जवन भासा आपन सवालो दोसरा भासा में उठावल करी ओकर आवाज केहु काहे आ कइसे सुनी. भोजपुरी अगर आजु जिन्दा बिया त आम आदमी का चलते. बाकि बकरी के माई कहिया ले खरजिउतिया मनाई. आजु ना त काल्हु ओकरा कटाहीं के बा.

रउरो सभे सोचत होखब कि काल्हु फगुआ बा आ ई बतंगड़ा कवन राग उठा लिहलसि. हर हप्ता एगो खम्भा खड़ा कइल आसान ना होखे. कई बेर ओकरा मजबूरन खुरपी का बिआह में हँसुआ के गीत उठावे पड़ जाला. चारो तरफ आजु चुनाव परिणाम के चरचा चलत बा. एह प अगर कवनो अटकर पचीसा लगाईं त ओकरा गलत होखे के पूरा अनेसा रही. कहले बा बड़ बड़ जने दहाइल जासु,गदहा थाहे कतना पानी. अब जवन होखे के बा तवन काल्हु सामने आइए जाई. बाकि हमरा हर हाल में एह लेख के आजु पठा देबे के बा ना त सम्पादक जी लुकारी भाँजे लगीहें. समहुत जहिया जरी तहिया जरी, बाकि हम त आजुए झँउसि जाइब.

एक बेर मन भइल कि फगुए प लिख मारीं. बाकि फगुआ लउके त पहिले. तीन दिन बादे फगुआ बा आ कतहीं ना त फगुआ के गाजन बाजन सुनाता ना केहु का देह प रंग अबीर लउकत बा. पिया परदेस, देवर घरे लईका, सूतल भसुर के जगाईं कइसे का उहा पोह में पड़ल बिरहिनी परेशान बिया कि पिया नाहीं अइले अबकी फगुनवो में. भाग दौड़ भरल जिनिगी में रोजी रोटी कमाए परदेसे गइल पिया बलमा के तिकवते ओकर फगुआ बीते जात बा. आ हम खोजत बानी अपना लइकाईं का दिन के उमंग उल्लास से भरल फगुआ. जब राहे पेड़ा निकलत हमेशा चौकन्ना रहे के पड़त रहुवे कि केनियो से रंग पानी भेंटा मत जाए. बाकि हिन्दू परब तेवहारन प सेकूलर हमला ई हाल क दिहले बा कि रंग-अबीर, कादो-पानी वाला फगुआ से साम्प्रदायिक बवाल मत हो जाए एह डरे रंग डाले के परम्परे भुलाइल जात बा. गीत-गवनई, फगुआ-चइतो बिसरल जात बा काहे कि कुछ लोग भोजपुरी के अश्लीलता खतम कइल चाहत बा. संवैधानिक मान्यता ला परेशान लोग ई नइखे सोचत कि भासा बचल रही तबे मान्यता के फायदा बा. ना त अकादमीओ के काम दोसरे भासा में करे के पड़ी. हम त हिन्दी से लाख नाराजगी का बादो कुछ हिन्दी वालन के आभारी बानी जे हिन्दी का अखबार में भोजपुरी के खम्भा उठावे के जगहा दे देत बा. ना त भोजपुरिया इलाका के हिन्दी साहित्यकार इचिको ना चाहसु कि भोजपुरी के ओकर हक मिल जाव.

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