बकसऽ ऐ बिलार, मुरुगा बाँड़ हो के रहीहें : बाति के बतंगड़ – 15

– ओ. पी. सिंह


मोदी जी नोटबन्दी के एलान का कइलें, जनता के शुभचिन्तक होखे के स्वांग करत नेतवन के लाइन लाग गइल. दीदीया आ बहिना के त बाते छोड़ीं बबुअवो कूद फान मचावे लागल बा. अचके में देश के सगरी समस्या खतम हो गइल बा. ना कहीं डकैती होखत बा, ना अपहरण, नक्सली आ आतंकियो हरकतन प लगाम लाग गइल होखे जइसे. रंगदारन के तरीका बदलि गइल बा. अब ऊ छोट छोट व्यापारियन के लाख दू लाख के नोट दे के छुट्टा करावे के धमकी देत बाड़ें सँ. चारा से पइसा बनावे वाला चारा चोर परेशान हो गइल बा. एही जिनिगी मे ओकरा देखे के मिल गइल पइसा के चारा बनत. उहो जनता के शुभ चिन्तक बनि के घूमत बाड़न. लोहियावादी परिवार के झगड़ा ओरा गइल. भोपाल जेल से भागल आतंकियन के मुठभेड़ क के मार गिरावे के मुद्दा भुला गइल बा. जब आपन जान साँसत में पड़ि गइल बा त मजबूरी में जनता के उकसावे के कोशिश होखत बा.
ओने जनतो अपने परेशानी में हलकान बिया. घर के सगरी सवांग कवनो ना कवनो बैंक का लाइन में खड़ा बाड़े. बेरोजगारन के बेरोजगारी दूर हो गइल बा. आपन ना त दोसरे के पइसा भँजा के कुछ दिहाड़ी मिल जात बा. जनता के एह बाति से तनिको मतलब नइखे कि चिट फंड के पइसा, टिकट के कमाई, घोटाला के धन, कालाबाजारी के कमाई, नक्सलियन के वसूली, घूसखोरी के रुपिया के कइसे बचावल जाव. ओकरो मालूम बा कि ओकर शुभचिन्तक होखे के स्वांग करत एह नेतवन के असल चिन्ता का बा. एहिसे ऊ एह लोग के अपना रुख से जता देत बिया कि – बकसऽ ऐ बिलार, मुरुगा बाँड़ हो के रहीहें !
एह देश के लोगन के पुरान अनुभव बा लाइन लगावे के बाकिर अबकी एगो नया अनुभव होखत बा. अध-अध किलोमीटर लमहर लाइन लागत बाड़ी सँ बाकि कतहीं कवनो बवाल नइखे होखत आ ई देखि के एह नेतवन के फिकिर अउर बढ़ल जात बा. ई लोग एही फेरा में लागल बा कवना तरह से जनता के भड़कावल जाव कि देश में बवाल हो जाव आ मोदी सरकार सकेता में पड़ि जाव. मीडिया के कुछ एंकरन के परेशानी देखल बनत बा. ओहु लोग के नइखे बुझात कि देश के लोग के ठकुआ काहे मरले बा. यूपी पंजाब के चुनाव कपारे बा आ लोग बहके ला तइयार नइखे.
ओने मोदी के राजनीति सफल होखल जात बा. हिन्दू-मुसलमान, अगड़ा-पिछड़ा के लड़ाई कतना आसानी से गरीब बनाम अमीर के लड़ाई बनि गइल बा. धनबल के बेंवत खतम होखत लउकत बा. बाकि देश के बाकी गोल एह लड़ाई में अतना आसानी से हरदी-गुरदी बोले ला तइयार नइखन. सभे साँस थमले समय के इन्तजार करत बा. देखल चाहत बा कि बैंकन का लाइन में खड़ा भइल लोग कब खाली होखत बा. खाली दिमाग शैतान के घर. जसहीं एह लोग के फौरी चिन्ता खतम होखी तरह तरह के बहाना से आग लगावे के कोशिश शुरू हो जाई.
चलत-चलत एगो वाकया सुनवले जात बानी. एगो नौकर आपना मालिक-मलकिनी के किचकिच से परेशान हो गइल रहुवे. कबो समय पर दूध ला औंटाये के शिकायत, त कबो गाढ़ ना होखे के. कबो दही पातर हो जाव, त कबो खट्टा. आजिज आके एकदिन दूधवे उठा के पी गइल. कहलसि कि –
ना औंटब ना पौढ़ब, ना दही जमाएब. दूधवे उठा के पी जाएब, एकेगो ओरहन रही.
आ सचहूं आजु देश का सोझा एके गो समस्या रहि गइल बा – नोट कइसे बदलाव.

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