बात पर बात (बतकुच्चन – 195)

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सरकार बदलले एक साल बीतल बा आ देश मे बतकही के दौर जारी बा. ई बतकही कब बतकही में बदल जाई केहु ना बता सके. बातचीत कब बाताबाती हो जात बा बुझाते नइखे. सरकार कुछ बोलत ना रहुवे त शिकायत रहुवे कि सरकारो के मालूम बा कि ओकरा लगे बतावे बोले जोग कुछ हइए नइखे. चुप रहुवे त सभे आपन आपना गाथा गढ़े में लागल रहुवे. आ जब बोले लागल त लोग परेशान बा कि बाप रे बाप अतना बात! लागत बा कि चुनाव के दौर आ गइल बा.

बात का साथे जब कुछ जुड़ेला त ऊ बत हो जाले, जइसे कि बतकही, बतबनवा, बतक्कड़, बतकहा, बतछूट, बतरस, बतबढ़ाव वगैरह मे. हालांकि हर बेर अइसन ना होखे आ बातचीत, बातफरोश, बाताबाती में बात बरकरार रह जाले. अब सोचीं कि बात होला का, त बात ऊ वाक्य होले जवना के कुछ मतलब होला, कवनो प्रसंग भा घटना के वर्णन होला, कवनो विषय के चरचा होला. बतकही में ई सब होखल जरूरी ना होखे. ओहिजा त बेबातो के बात बकल जाला. कहल गइल बा कि बात निकलेला त दूर तकले जाला भा दूर तक ले जाला. अब एहिजा तकले आ तक ले पर तकला के जरूरत बा. वइसे गहिराई से ताकीं त हो सकेला कि तकले आ तक ले में कवनो खास फरक ना रहि जाव. एगो में बात दूर तक जात बा आ दोसरका में दूर तक ले जात बा. बातफरोश भा बतबनवा गुनगर भइल त ऊ बहुत दूर तक ले जा सकेला रउरा के. आ इहे कहत बा ऊ लोग जे महाबतबनवा का बारे में कहत बा कि ई अपना बात का कलाकारी से लोग के अपना संगे बहा ले गइलें.

अब पूछत बा ऊ लोग कि कहाँ बा ऊ नीमनका दिन जवना के वादा रहुवे. एकरे जवाब में उनकर सीधा कहना बा कि सभका ला नीमन दिन के वादा त कबो ना कइले रहीं. कुछ लोग के त बाउर दिन आ गइल बा आ ओह लोग के नीमन दिन अब कबो नइखे आवे वाला. आ बातो कुछ कुछ अइसने बा. नीमन दिन का बारे में सबले अधिका उहे पूछत बा जे कबो सोचलो ना रहे कि दिन बदले वाला बा. ओकरा त लागत रहुवे कि जनता के आँखि पर अइसन पट्टी बन्हले बानी जा कि ओकरा साँच कबो लउकबे ना करी. बाकिर जब दिन सचहुं बदल गइल त सोच में पड़ गइल बा लोग. दू दू महीना के छुट्टी ले के एह सोच पर सोचला का बाद लोग बदल के आइल बा.

बाकिर साँच कहीं त बतफरोशी भा बात बनावे गढ़े के कला सभका लगे ना होखे. दोसरा के सिखवला पढ़वला पर सूट बूट के चरचा क के उछले वाला के पते ना रहुवे कि लोग ओकर मय खानदान के सूट बूट संगे देखावत बात के बहुते दूर तक ले के चल जाई. बाकिर बतकही के दौर जारी बा. बतरसिया लोग बतरस के आनन्द लेत बा. आम आदमी त ओह सवाल के याद करत बा जब कवनो सूरदास से पुछाइल रहे कि ऐ सूरदास, घीव पड़ल? त ऊ जवाब दिहले रहलें कि कड़कड़ाव तब नू जानीं! आमो आदमी एही कड़कड़इला के तिकवे में लागल बा. तबले रसोई में गरम तेल से छनछनाहट के आवाज ओकर आस बन्हले बा.

बाकिर आस का आस में कबले इन्तजार करी आम आदमी! ओकर याददाश्त कमजोर होखेला आ धीरजो कमे होला. दोसरा के पलटू बतावत ऊ खुदे कब पलटी मार दी एकर पता शायद ओकरो ना होखे. एही से रहीमो बाबा कह गइल बाड़न कि रहिमन चुप ह्वै बैठिए, देखि दिनन के फेर. जब नीके दिन आइहें बनत ना लगीहें देर!

बाकिर का बबुुअन का लगे अतना धीरज बा?

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