– ओ. पी. सिंह

राजनीति के रंग-ढंग रंगो मैं राजनीति ले के चल आइल बा. कहल जाला कि राजनीति के असर जिनिगी के हर पहलू प पड़ेला आ एकरा से बाचल ना जा सके. बाकिर जब ई रंगो में राजनीति देखे लागे, ओकरा के गाढ़ करे लागे त नोटिस लीहल जरुरी हो जाला.
केहू माने भा मत माने, अपना देश के मूल में हिन्दू संस्कार बा जवना प बाद में आइल हमलावरन के संस्कृति संस्कारन के असर पड़त गइल. हिन्दू संस्कार भेदभाव के खिलाफ रहल बा. एह संस्कार में वसुधैव कुटुम्बकम के भावना शुरु से रहल बा. एही चलते हिन्दू सम्प्रदाय ना बन सकल आ धर्म का राह प बरकरार रहि गइल. जबकि बाद में आइल रिलीजन, मजहब, पंथ भा सम्प्रदाय आपन अलग अलग दायरा बनावत गइल. हिन्दुत्व अपना प्रसार प्रभुत्व ला कबो ताकत के तलवार के इस्तेमाल ना कइलसि आ ओकर इहे भाव मान के चलल कि सत्य त एके ह बाकिर विद्वान ओकरा के अलग अलग तरीका से जाहिर करेलें. एहसे जब हिन्दू मानस खुशी मनावेला तब अपना उल्लास में ऊ अबीर गुलाल के रंग ना देखे आ सभके ओही चाव से अपनावेला. ऊ अपना उल्लास में भगवा रंग तक बान्ह के ना राखे. ओकरा ला हर रंग खुशी आ उमंग के रंग होला. होली का हुड़दंग में त करियो रंग से दुराव ना राखल जाला.
बाकिर देश में हिन्दुत्व विरोध के राजनीति करे वाला आपन रंग छोड़ दोसर रंग ना देखल चाहसु. बँवारा गोल त भारतीयता आ हिन्दुस्लानी तहजीब से अतना नफरत करेला कि ऊ रंग आ गुलाल से आपन खुशी ना मनावे. ओकरा ला आदमी के लाल खून बहावले आपन खुशी आ ताकत के इजहार करे के माध्यम होला. दलित राजनीति करे वालन के बहिना के बुलु रंग से प्यार लउकेला जबकि माटी मानुष के राजनीति करे वाली दीदिया के हरियर रंग से. एह लोग कै विचार बेवहार अतना सकेता मे चलेला कि ई लोग गलतियो से लाल पीयर गुलाल के इस्तेमाल ना करे. राजनीति के ई रंग आजु हमरा के रंग के राजनीति प लिखे ला बेबस क दिहलसि.
पश्चिम बंगाल के पंचायती चुनाव में दीदिया के गोल के जवन शानदार सफलता मिलल ओकर इजहार ई लोग अपना के हरियर रंग में पोत के कइल. अलग बाति बा कि जवना फरीक के वोट का लालच में ई लोग एह रंग के अपनेवले बा ओह फरीक के हम रंग उड़ावत नइखीं देखले. एही दौरान जन्माष्टमी के पर्वो आइल रहुवे. भगवान कृष्ण के जनम मथुरा के जेल में भइल रहल से एह मौका प खास क के यूपी में परम्परा बन गइल बा कि जेल आ थाना हाजत में जन्माष्टमी मनावे के. ई परम्परा हाल फिलहाल के ना ह बाकिर कुछ लोग के अब एह परम्परा से दिक्कत होखे लागल बा. हर बात के फिरकावाराना नजरिया से देखे वाला एकरा प सवाल उठावल शुरु कइले बाड़न. बाकिर एगो पुरान सीख ह कि ना अति बोलता, ना अति चुप, ना अति बरखा, ना अति धूप. अतहत कवने बाति के होखो, एक ना एक दिन ओकर बेअसर होखल तय बा अगर ऊ अनेत करे लागे. काश्मीर का बारे में इहे लोग कहेला कि ओकर मुख्यमंत्री हिन्दू ना हो सके. ई कहत में एह लोग के सिकुलरिज्म के कवनो हिचकिचाहट ना होखे बाकिर अगर इहे बाति दोसरा राज्यन से उठे लागे तब एह लोग के कुकर बझाँव कान फोड़े लागी.
हमरो एह बाति के शिकायत नइखे कि ई लोग अपना उल्लास में लाल पीयर गुलाल काहे ना उड़ावे, हमार विरोध एह सकेताइल सोच से बा जे अपना के एगो खास रंग ले सम्ट के रखले बा. देर सबेर इहे होखे के बा जवन अब बंगाल में लउके लागल बा. एकरा के इरिखा के हरियरी से तोपल ना जा सके. सुजलाम सुफलाम मलयज शीतलाम शस्य श्यामला मातरम के भाव सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा से अलग ना होखे के चाहीं. बाकिर एकरा के जानबूझि के अलगा राखल जात बा. कहीं एह लोग के सोच ई ल नइखे कि हिदुस्तान तबहियें ले सारे जहाँ से अच्छा मानल जाई जबले ई हमार सगरी अतहत बरदाश्त करत रहो.


(20 अगस्त 2017 तारीख के समाज्ञा अखबार में अँजोर भइल)

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