लटकले त गइले बेटा – बतंगड़ 85

हमहीं ना बहुते लोग बस-ट्रक का पीछे लिखल तरह तरह के संदेशन के धेयान से देखेला आ ओहसे जनता के नब्ज धरे के कोशिश करेला. कई बेर बसन पर लिखल ई संदेश पढ़ले बानी कि – लटकले त गइले बेटा ! आजु जब एह पर देश के मौजूदा हालात देखत सोचल शुरु कइनी त लागल कि ई शाश्वत संदेश बा देशवासियन ला, देशप्रेमियन ला. लटके के सबले बड़का नमूना रहलन त्रिशंकु. इक्ष्वांकु कुल के महाराजा त्रिशंकु का मन में भइल कि भाग्य भरोसे ना रहि के अपना पुरुषार्थ का बल पर सशरीर स्वर्ग जाए के कोशिश करीं. एह काम में सबसे पहिले ऊ महर्षि वशिष्ठ से यज्ञ करावे के याचना कइलें त ऊ मना कर दिहलें. ओकरा बाद त्रिशंकु गुरु वशिष्ठ के पुत्रन के शरणागत भइलें त ओहिजो से मनाही सुनला का बाद कहलन कि तब हम कवनो दोसरा ऋषि का शरण में जाएब. ई सुनिके वशिष्ठपुत्र अइसन नाराज भइलें कि श्राप दे दिहलें कि जो चाण्डाल बनि जो ! अब एह श्राप का चलते चाण्डाल घोषित हो चुकल त्रिशंकु का राज से जनता दोसरा राज में जाइल शुरु कर दिहलसि. मंत्रीगणो उनुका के तज दिहलें. बाकिर अपना ध्येयपथ पर अडिग त्रिशंकु हार माने के तइयार ना रहलन. आखिरकार उनुका महर्षि विश्वमित्र से अभयदान मिलल आ ऊ त्रिशंकु के सशरीर स्वर्ग भेजे ला यज्ञ करावल शुरु कर दिहलें. एह यज्ञ में बाकिओ ऋषि महर्षि लोग शामिल भइल आ यज्ञ का अन्त में त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग ला प्रस्थान कर दिहलें. ओने सशरीर त्रिशंकु के आवत देखि देवता लोग उनुका के उलुटा वापिस कर दिहलें. वापस लवटत त्रिशंकु के तब महर्षि विश्वमित्र फेरु स्वर्ग ला भेज दिहलें. एही उठा पटक का बीच देवता लोग तब महर्षि विश्वमित्र के गोहार लगवलें कि हे मुनिवर, कवनो शापित आदमी देवता ला बनावल स्वर्ग में कइसे जा सकेला. एह पर महर्षि विश्वमित्र कहनी कि हम त इनका के स्वर्ग भेज के रहब. अगर तू लोग अपना वाला स्वर्ग में इनका के ना आवे देबे त हम इनका ला अलगे स्वर्ग बना देब. आ बनाइओ दिहलें. महाराज त्रिशंकु ओही स्वर्ग में सशरीर रहे लगलन बाकिर आम जन मानस में कहल जाला कि त्रिशंकु धरती आ स्वर्ग का बीचे लटकल बाड़न.
कथा सुनला का बाद लवटल जाव देश दुनिया का मौजूदा हालात पर. देश के बहुसंख्यक जनता के ई जिम्मेदारी बनत बा कि ऊ अपना पुरुषार्थ का बल पर अवना सपनन के पुरावे के संकल्प लेव आ जवन ऋषि ओकरा सपना के पूरा करावे ला सगरी जतन करे ला तइयार बा ओकरे बतावल राहि पर चले. पहिले से स्वर्ग पर काबिज हो चुकल लोग हर तिकड़म करे पर लागल बा कि ओकरा के नीचहीं गिरवले राखल जाव. ओह लोग के लागत बा कि अगर एही तरह होखे लागल त फेर हर अदमिए आपन सपना पुरावे लागी आ फेरु ओकरा देवत्व के का होखी. अपना स्वर्ग पर फेरु से काबिज होखे का फेर में सत्ताच्यूत हो चुकल एह पुरनका देवतन के मलेच्छनो के सहारा लेबे में इचिको हिचक नइखे. ऊ रउरा सब के हर तरह से कमजोर करे, एक दोसरा से अलगा-बिलगा करे में लागल बाड़ें. सावधान रहीं आ आपन जिम्मेदारी समुझे के कोशिश करीं सभे. महर्षि विश्वमित्र रउरा सभेला एगो नया स्वर्ग बनावे तक ला तइयार बाड़न. अब ई हमनिए सभ पर बा कि का फैसला लेत बानी जा. अपना ला स्वर्ग बनावल हमनिए का हाथ में. दोसरा के बहकावा में अइला का बाद कुछ ना कइल जा सकी. ना खुदा ही मिली ना बिसाले सनम, ना इधर के रहब ना उधर के रहब !

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